राष्ट्रीय

जीएसटी, नोटबंदी के असर ने पीछा नहीं छोड़ा है

COURTESY DAINIK BHASKAR SEP 12

जीएसटी, नोटबंदी के असर ने पीछा नहीं छोड़ा है
देश में उदार आर्थिक नीतियों के सूत्रधार, दस साल तक प्रधानमंत्री रहे विश्व विख्यात अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह भारत में आर्थिक मंदी के मौजूदा माहौल से खासे चिंतित हैं। दैनिक भास्कर के राजनीतिक संपादक हेमन्त अत्री से बेबाक सवाल-जवाब में डॉ. सिंह ने मौजूदा हालात के लिए पूरी तरह मोदी सरकार की गलत आर्थिक नीितयों को दोषी ठहराते हुए इससे निपटने का रोड़ मैप भी साझा किया है। पेश है डॉ. सिंह से सवाल-जवाब के संपादित अंश-

एक ओर हम मोदी-2 शासन के पहले 100 दिन की उपलब्धियों का प्रचार अभियान देख रहे हैं तो दूसरी ओर आपने देश की अर्थव्यवस्था को गहरी चिंता का विषय बताया है। क्या स्थिति वास्तव में इतनी गंभीर है? इस आर्थिक मंदी से बाहर आने में कितना समय लगेगा?
-अपने काम पर बात करना मोदी सरकार का विशेषाधिकार है, लेकिन सरकार अब अर्थव्यवस्था के बारे में इनकार की मुद्रा में नहीं रह सकती। भारत बहुत चिंताजनक आर्थिक मंदी में है। पिछली तिमाही की 5% जीडीपी विकास दर 6 वर्षों में सबसे कम है। नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ भी 15 साल के निचले स्तर पर है। अर्थव्यवस्था के कई प्रमुख क्षेत्रों को प्रभावित हुए हैं। ऑटोमोटिव सेक्टर उत्पादन में भारी गिरावट से संकट में है। साढ़े तीन लाख से ज्यादा नौकरियां जा चुकी हैं। मानेसर, पिंपरी-चिंचवड़ और चेन्नई जैसे ऑटोमोटिव हबों में इस दर्द को महसूस किया जा सकता है। असर इससे संबंधित उद्योगों पर भी है। अधिक चिंता ट्रक उत्पादन में मंदी से है, जो माल और आवश्यक वस्तुओं की धीमी मांग का स्पष्ट संकेत है। समग्र मंदी ने सेवा क्षेत्र को भी प्रभावित किया है। पिछले कुछ समय से रियल एस्टेट सेक्टर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पा रहा है, जिससे ईंट, स्टील व इलेक्ट्रिकल्स जैसे संबद्ध उद्योग भी प्रभावित हो रहे हैं। कोयला, कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के उत्पादन में गिरावट के बाद कोर सेक्टर धीमा हो गया है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था फसल की अपर्याप्त कीमतों से ग्रस्त है। 2017-18 में बेरोजगारी 45 साल के उच्च स्तर पर रही। आर्थिक विकास बढ़ाने का विश्वसनीय इंजन रही खपत, 18 महीने के निचले स्तर तक पहुंच गई है। बिस्कुट के पांच रुपए के पैकेट की बिक्री में गिरावट ने सारी कहानी खुद बयां कर दी हैा। उपभोक्ता ऋण की सीमित उपलब्धता और घरेलू बचत में गिरावट से खपत भी प्रभावित होती है।
मेरे अनुमान में, इस मंदी से बाहर आने में कुछ साल लगेंगे बशर्ते सरकार अभी समझदारी से काम ले। हालांकि हम यह न भूलें कि नोटबंदी की भयंकर गलती के बाद जीएसटी के दोषपूर्ण अमल ने इस मंदी को जन्म दिया। आरबीआई ने हाल ही में ऐसे आंकड़े पेश किए हैं, जिनसे पता चलता है कि उपभोक्ता वस्तुओं के ऋणों के लिए सकल बैंक जोखिम में 2016 के अंत अर्थात नोटबंदी के बाद से लगातार गिरावट हुई है। इस डेटा से अर्थव्यवस्था की मांग संबंधी समस्याएं प्रदर्शित होती हैं।
आप लगातार कहते रहे हैं कि नोटबंदी व त्रुटिपूर्ण जीएसटी मौजूदा संकट के मुख्य कारण हैं। पूर्व मुख्य स्टैटिस्टिशियन प्रणब सेन भी एक साक्षात्कार में इससे सहमत थे। आपकी नजर में नोटबंदी व जीएसटी का अर्थव्यवस्था पर कुल प्रभाव क्या रहा? दोनों ने उद्यमिता व रोजगार को किस तरह प्रभावित किया?
-हां, वे सही है। यह नकदी की कमी के कारण उत्पन्न संकट है। भारत में पर्याप्त अनौपचारिक अर्थव्यवस्था है जो नकदी पर चलती है। इसके बड़े हिस्से में वैध गतिविधियां शामिल हैं, जो कर सीमा के दायरे से बाहर हैं और इसलिए इन्हें 'काली' अर्थव्यवस्था का हिस्सा नहीं मानना चाहिए। मसलन, कृषि क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 15% है, जो मुख्य रूप से नकदी पर चलती है और ज्यादातर कर-मुक्त है। यह नोटबंदी के दौरान सिस्टम से नकदी गायब होने से प्रभावित हुई थी। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) ने बताया कि नोटबंदी के ठीक बाद जनवरी-अप्रैल 2017 के दौरान असंगठित क्षेत्र में डेढ करोड़ नौकरियां खत्म हो गईं। इसके बड़ी संख्या में लोग गांवों में लौट गए और मनरेगा के काम की मांग में काफी वृद्धि हुई। जब तत्कालीन वित्त मंत्री ने मनरेगा को रिकॉर्ड बजट आवंटन की बात की, तो यह गहरे ग्रामीण संकट की स्वीकृति थी। हमने हाल ही में देखा कि कार्पोरेट निवेश जीडीपी के 7.5% से गिरकर सकल घरेलू उत्पाद का केवल 2.7% हो गया। यह 2010-11 में सकल घरेलू उत्पाद के 15% के रूप में उच्च स्तर पर था। जाहिर है नोटबंदी के प्रभाव से संगठित क्षेत्र भी नहीं बचे। एक तरफ जहां नोटबंदी असर काफी वक्त तक कायम था, वहीं सरकार ने जीएसटी को इतनी जल्दबाजी में पेश किया कि इसने अर्थव्यवस्था को एक और बड़ा झटका दे दिया। हम जीएसटी के समर्थक हैं। हालांकि, इसे खराब तरीके से लागू किया गया। उदाहरण के लिए, एमएसएमई से सोर्सिंग भी प्रभावित हुई क्योंकि बड़ी कंपनियां उन आपूर्तिकर्ताओं से खरीद करना पसंद करती थीं, जो जीएसटी रसीद प्रदान कर सकते थे। अन्य मामलों में, आयात को उन छोटी भारतीय कंपनियों से सोर्सिंग पर प्राथमिकता दी गई, जो जीएसटी के दायरे में मुश्किल से ही आ पा रहीं थीं। इससे पूरी आपूर्ति शृंखला बाधित हो गई और चीनी आयातों की हमारे बाजारों में बाढ़ आ गई है। कई स्लैब वाले जीएसटी ढांचे, दरों में लगातार कटौती और नियमों के बदलने ने छोटे और मध्यम व्यवसायों को भी चोट पहुंचाई है।
एक तरफ, सरकार ने बैंकों से उपभोक्ताओं और उद्यमियों को विकास को बढ़ावा देने के लिए ऋण देने का आग्रह किया है, दूसरी ओर इसने बैंक विलय को मंजूरी दे दी है। क्या बैंक विलय से बैंकिंग क्षेत्र की समस्याओं का समाधान होगा?
-सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का विलय, बैंकिंग क्षेत्र को सुव्यवस्थित और मजबूत बनाने में मदद कर सकता है। लेकिन क्या इसके लिए यह सही समय है? समय की जरूरत है कि नकदी के प्रवाह को सुगम बनाया जाए और नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स की चुनौती को दूर किया जाए। इन पर अपना ध्यान केंद्रित करने के बजाय केवल विलय से बैंकरों का ध्यान एकीकरण की चुनौतियों पर ही केंद्रित हो सकता है। विलय की प्रक्रिया काफी जटिल होती है। हमारे बैंकों को उनके संक्रमण काल के दौरान सहायता करने के लिए किसी भी रणनीतिक योजना की कमी इस समस्या को और बढ़ाएगी। सरकार इस धारणा पर भी भरोसा कर रही है कि कमज़ोर बैंकों का मज़बूत बैंकों में विलय करके कमियां दूर करके बड़े और मज़बूत बैंक बनाएंगे। लेकिन यह उतना ही संभव है कि कमजोर बैंक, मजबूत बैंकों को भी अपनी ओर खींच लेंे, क्योंकि उनके पास कमजोर बैलेंस शीट हैं। वास्तव में कुछ बड़े बैंक खुद एक कमजोर क्रेडिट प्रोफाइल का अनुभव कर रहे हैं। विलय के लिए चुने गए बैंकों में से एक वर्तमान में प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन फ्रेमवर्क के अंतर्गत है और एक अन्य को हाल ही में इस साल फरवरी में हटा दिया गया था। इन बैंकों की कमजोरियां अब एंकर बैंक तक बढ़ जाएंगी। हमने अभी तक 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के सभी सबकों को नहीं सीखा है। सरकार उन संरचनात्मक मुद्दों के समाधान की पहल में भी विफल रही है जो सार्वजनिक बैंकिंग क्षेत्र में समस्याओं का सामना कर रहे हैं।
क्या कांग्रेस रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभा पाई?
-बिल्कुल, पूर्ण रूप से। हम जहां तक भी जरूरत है, वहां तक पहुंचने और सहायता प्रदान करने की नीति पर चल रहे हैं। राहुल गांधी ने सरकार से अनुरोध किया कि सरकार जल्दबाजी में जीएसटी लागू न करे। हमने सरकार से टैक्स स्लैब और जीएसटी संरचना को तर्कसंगत बनाने का अनुरोध किया। हर मंच से, आर्थिक वास्तविकता से सरकार को अवगत कराने और रचनात्मक समाधान पेश करने का हमारा निरंतर प्रयास था। आखिरकार सरकार ने हमारे कई सुझावों को मान भी लिया। जब सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून जैसे महत्वपूर्ण जन-हितैषी उपायों को उलटने की कोशिश की, तो हम अपने कड़े स्टैंड पर अडिग हो गए और सरकार को आखिरकार हमारे रुख का लाभ समझ में आया। यह भी याद रखना चाहिए कि जीएसटी जैसे कई कार्यक्रम हमारे विचार थे जिनका पहले भाजपा द्वारा विरोध किया गया था। इनमें गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी भी शामिल थे। प्रधानमंत्री ने संसद में मनरेगा की भी जमकर आलोचना की, लेकिन अब, यह देखते हुए कि सामाजिक सुरक्षा जाल के रूप में यह कितना महत्वपूर्ण है, सरकार ने इसके लिए काफी रकम आवंटित की है।
एक ओर हम मोदी-2 शासन के पहले 100 दिन की उपलब्धियों का प्रचार अभियान देख रहे हैं तो दूसरी ओर आपने देश की अर्थव्यवस्था को गहरी चिंता का विषय बताया है। क्या स्थिति वास्तव में इतनी गंभीर है? इस आर्थिक मंदी से बाहर आने में कितना समय लगेगा?
-अपने काम पर बात करना मोदी सरकार का विशेषाधिकार है, लेकिन सरकार अब अर्थव्यवस्था के बारे में इनकार की मुद्रा में नहीं रह सकती। भारत बहुत चिंताजनक आर्थिक मंदी में है। पिछली तिमाही की 5% जीडीपी विकास दर 6 वर्षों में सबसे कम है। नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ भी 15 साल के निचले स्तर पर है। अर्थव्यवस्था के कई प्रमुख क्षेत्रों को प्रभावित हुए हैं। ऑटोमोटिव सेक्टर उत्पादन में भारी गिरावट से संकट में है। साढ़े तीन लाख से ज्यादा नौकरियां जा चुकी हैं। मानेसर, पिंपरी-चिंचवड़ और चेन्नई जैसे ऑटोमोटिव हबों में इस दर्द को महसूस किया जा सकता है। असर इससे संबंधित उद्योगों पर भी है। अधिक चिंता ट्रक उत्पादन में मंदी से है, जो माल और आवश्यक वस्तुओं की धीमी मांग का स्पष्ट संकेत है। समग्र मंदी ने सेवा क्षेत्र को भी प्रभावित किया है। पिछले कुछ समय से रियल एस्टेट सेक्टर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पा रहा है, जिससे ईंट, स्टील व इलेक्ट्रिकल्स जैसे संबद्ध उद्योग भी प्रभावित हो रहे हैं। कोयला, कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के उत्पादन में गिरावट के बाद कोर सेक्टर धीमा हो गया है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था फसल की अपर्याप्त कीमतों से ग्रस्त है। 2017-18 में बेरोजगारी 45 साल के उच्च स्तर पर रही। आर्थिक विकास बढ़ाने का विश्वसनीय इंजन रही खपत, 18 महीने के निचले स्तर तक पहुंच गई है। बिस्कुट के पांच रुपए के पैकेट की बिक्री में गिरावट ने सारी कहानी खुद बयां कर दी हैा। उपभोक्ता ऋण की सीमित उपलब्धता और घरेलू बचत में गिरावट से खपत भी प्रभावित होती है।
मेरे अनुमान में, इस मंदी से बाहर आने में कुछ साल लगेंगे बशर्ते सरकार अभी समझदारी से काम ले। हालांकि हम यह न भूलें कि नोटबंदी की भयंकर गलती के बाद जीएसटी के दोषपूर्ण अमल ने इस मंदी को जन्म दिया। आरबीआई ने हाल ही में ऐसे आंकड़े पेश किए हैं, जिनसे पता चलता है कि उपभोक्ता वस्तुओं के ऋणों के लिए सकल बैंक जोखिम में 2016 के अंत अर्थात नोटबंदी के बाद से लगातार गिरावट हुई है। इस डेटा से अर्थव्यवस्था की मांग संबंधी समस्याएं प्रदर्शित होती हैं।
आप लगातार कहते रहे हैं कि नोटबंदी व त्रुटिपूर्ण जीएसटी मौजूदा संकट के मुख्य कारण हैं। पूर्व मुख्य स्टैटिस्टिशियन प्रणब सेन भी एक साक्षात्कार में इससे सहमत थे। आपकी नजर में नोटबंदी व जीएसटी का अर्थव्यवस्था पर कुल प्रभाव क्या रहा? दोनों ने उद्यमिता व रोजगार को किस तरह प्रभावित किया?
-हां, वे सही है। यह नकदी की कमी के कारण उत्पन्न संकट है। भारत में पर्याप्त अनौपचारिक अर्थव्यवस्था है जो नकदी पर चलती है। इसके बड़े हिस्से में वैध गतिविधियां शामिल हैं, जो कर सीमा के दायरे से बाहर हैं और इसलिए इन्हें 'काली' अर्थव्यवस्था का हिस्सा नहीं मानना चाहिए। मसलन, कृषि क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 15% है, जो मुख्य रूप से नकदी पर चलती है और ज्यादातर कर-मुक्त है। यह नोटबंदी के दौरान सिस्टम से नकदी गायब होने से प्रभावित हुई थी। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) ने बताया कि नोटबंदी के ठीक बाद जनवरी-अप्रैल 2017 के दौरान असंगठित क्षेत्र में डेढ करोड़ नौकरियां खत्म हो गईं। इसके बड़ी संख्या में लोग गांवों में लौट गए और मनरेगा के काम की मांग में काफी वृद्धि हुई। जब तत्कालीन वित्त मंत्री ने मनरेगा को रिकॉर्ड बजट आवंटन की बात की, तो यह गहरे ग्रामीण संकट की स्वीकृति थी। हमने हाल ही में देखा कि कार्पोरेट निवेश जीडीपी के 7.5% से गिरकर सकल घरेलू उत्पाद का केवल 2.7% हो गया। यह 2010-11 में सकल घरेलू उत्पाद के 15% के रूप में उच्च स्तर पर था। जाहिर है नोटबंदी के प्रभाव से संगठित क्षेत्र भी नहीं बचे। एक तरफ जहां नोटबंदी असर काफी वक्त तक कायम था, वहीं सरकार ने जीएसटी को इतनी जल्दबाजी में पेश किया कि इसने अर्थव्यवस्था को एक और बड़ा झटका दे दिया। हम जीएसटी के समर्थक हैं। हालांकि, इसे खराब तरीके से लागू किया गया। उदाहरण के लिए, एमएसएमई से सोर्सिंग भी प्रभावित हुई क्योंकि बड़ी कंपनियां उन आपूर्तिकर्ताओं से खरीद करना पसंद करती थीं, जो जीएसटी रसीद प्रदान कर सकते थे। अन्य मामलों में, आयात को उन छोटी भारतीय कंपनियों से सोर्सिंग पर प्राथमिकता दी गई, जो जीएसटी के दायरे में मुश्किल से ही आ पा रहीं थीं। इससे पूरी आपूर्ति शृंखला बाधित हो गई और चीनी आयातों की हमारे बाजारों में बाढ़ आ गई है। कई स्लैब वाले जीएसटी ढांचे, दरों में लगातार कटौती और नियमों के बदलने ने छोटे और मध्यम व्यवसायों को भी चोट पहुंचाई है।
एक तरफ, सरकार ने बैंकों से उपभोक्ताओं और उद्यमियों को विकास को बढ़ावा देने के लिए ऋण देने का आग्रह किया है, दूसरी ओर इसने बैंक विलय को मंजूरी दे दी है। क्या बैंक विलय से बैंकिंग क्षेत्र की समस्याओं का समाधान होगा?
-सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का विलय, बैंकिंग क्षेत्र को सुव्यवस्थित और मजबूत बनाने में मदद कर सकता है। लेकिन क्या इसके लिए यह सही समय है? समय की जरूरत है कि नकदी के प्रवाह को सुगम बनाया जाए और नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स की चुनौती को दूर किया जाए। इन पर अपना ध्यान केंद्रित करने के बजाय केवल विलय से बैंकरों का ध्यान एकीकरण की चुनौतियों पर ही केंद्रित हो सकता है। विलय की प्रक्रिया काफी जटिल होती है। हमारे बैंकों को उनके संक्रमण काल के दौरान सहायता करने के लिए किसी भी रणनीतिक योजना की कमी इस समस्या को और बढ़ाएगी। सरकार इस धारणा पर भी भरोसा कर रही है कि कमज़ोर बैंकों का मज़बूत बैंकों में विलय करके कमियां दूर करके बड़े और मज़बूत बैंक बनाएंगे। लेकिन यह उतना ही संभव है कि कमजोर बैंक, मजबूत बैंकों को भी अपनी ओर खींच लेंे, क्योंकि उनके पास कमजोर बैलेंस शीट हैं। वास्तव में कुछ बड़े बैंक खुद एक कमजोर क्रेडिट प्रोफाइल का अनुभव कर रहे हैं। विलय के लिए चुने गए बैंकों में से एक वर्तमान में प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन फ्रेमवर्क के अंतर्गत है और एक अन्य को हाल ही में इस साल फरवरी में हटा दिया गया था। इन बैंकों की कमजोरियां अब एंकर बैंक तक बढ़ जाएंगी। हमने अभी तक 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के सभी सबकों को नहीं सीखा है। सरकार उन संरचनात्मक मुद्दों के समाधान की पहल में भी विफल रही है जो सार्वजनिक बैंकिंग क्षेत्र में समस्याओं का सामना कर रहे हैं।
क्या कांग्रेस रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभा पाई?
-बिल्कुल, पूर्ण रूप से। हम जहां तक भी जरूरत है, वहां तक पहुंचने और सहायता प्रदान करने की नीति पर चल रहे हैं। राहुल गांधी ने सरकार से अनुरोध किया कि सरकार जल्दबाजी में जीएसटी लागू न करे। हमने सरकार से टैक्स स्लैब और जीएसटी संरचना को तर्कसंगत बनाने का अनुरोध किया। हर मंच से, आर्थिक वास्तविकता से सरकार को अवगत कराने और रचनात्मक समाधान पेश करने का हमारा निरंतर प्रयास था। आखिरकार सरकार ने हमारे कई सुझावों को मान भी लिया। जब सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून जैसे महत्वपूर्ण जन-हितैषी उपायों को उलटने की कोशिश की, तो हम अपने कड़े स्टैंड पर अडिग हो गए और सरकार को आखिरकार हमारे रुख का लाभ समझ में आया। यह भी याद रखना चाहिए कि जीएसटी जैसे कई कार्यक्रम हमारे विचार थे जिनका पहले भाजपा द्वारा विरोध किया गया था। इनमें गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी भी शामिल थे। प्रधानमंत्री ने संसद में मनरेगा की भी जमकर आलोचना की, लेकिन अब, यह देखते हुए कि सामाजिक सुरक्षा जाल के रूप में यह कितना महत्वपूर्ण है, सरकार ने इसके लिए काफी रकम आवंटित की है।
अगर उपभोक्ताओं को कच्चे तेल की कम कीमतों का लाभ दिया जाता तो शायद हम उस मंदी से बच सकते थे, जो अब हम आज महसूस कर रहे हैं।'
अपनी वित्तीय नीति और आर्थिक प्रबंधन के संदर्भ में आप भारतीय जनता पार्टी सरकार का पहला कार्यकाल कैसे देखते हैं?
-भाजपा सरकार के पहले कार्यकाल की स्थायी विरासतें नोटबंदी और जीएसटी हैं, जिसने अर्थव्यवस्था का दूसरे कार्यकाल में भी पीछा नहीं छोड़ा है। मोदी सरकार का अन्य प्रमुख फोकस मुद्रास्फीति पर नियंत्रण था। यह हमारे कृषि क्षेत्र की कीमत पर आया है। कृषि आय 14 साल के निचले स्तर पर गिर गई है, कृषि-निर्यात सिकुड़ गया है, और आयात तेजी से बढ़ रहा है। इसने स्थिर मजदूरी और खपत में गिरावट में भी योगदान दिया, विशेष रूप से हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में। मोदी सरकार एनपीए संकट से निपटने में धीमी थी, जिसने अब एनबीएफसी क्षेत्र को भी प्रभावित किया है। इसके परिणामस्वरूप बैंकों को ऋण देने में दिक्कत हो रही है और उद्यमियों को ऋण लेने और निवेश करने में अनिच्छा हो रही है। अब बैंक फ्रॉड भी बढ़ गए हैं। इस मोर्चे पर मोदी सरकार की देरी से की गई कार्रवाई, देश के लिए महंगी साबित हुई है। जबकि इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी प्रक्रिया एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक सुधार है, वर्तमान स्थिति में यह विशाल एमएसएमई क्षेत्र में मदद नहीं कर सकता। आर्थिक रूप से, सरकार ने राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम द्वारा निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करने की कोशिश पर बहुत जोर दिया। लेकिन इससे सरकार को पेट्रोलियम उत्पादों पर करों और उपकरों को आक्रामक रूप से लागू करना पड़ा जबकि अंतरराष्ट्रीय बााजार में कच्चे तेल की कीमतें कम थीं। अगर उपभोक्ताओं को कम कीमतों का लाभ दिया जाता तो शायद हम, उस मंदी से बच सकते हैं जो अब हम अनुभव कर रहे हैं।
एक ओर हम मोदी-2 शासन के पहले 100 दिन की उपलब्धियों का प्रचार अभियान देख रहे हैं तो दूसरी ओर आपने देश की अर्थव्यवस्था को गहरी चिंता का विषय बताया है। क्या स्थिति वास्तव में इतनी गंभीर है? इस आर्थिक मंदी से बाहर आने में कितना समय लगेगा?
-अपने काम पर बात करना मोदी सरकार का विशेषाधिकार है, लेकिन सरकार अब अर्थव्यवस्था के बारे में इनकार की मुद्रा में नहीं रह सकती। भारत बहुत चिंताजनक आर्थिक मंदी में है। पिछली तिमाही की 5% जीडीपी विकास दर 6 वर्षों में सबसे कम है। नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ भी 15 साल के निचले स्तर पर है। अर्थव्यवस्था के कई प्रमुख क्षेत्रों को प्रभावित हुए हैं। ऑटोमोटिव सेक्टर उत्पादन में भारी गिरावट से संकट में है। साढ़े तीन लाख से ज्यादा नौकरियां जा चुकी हैं। मानेसर, पिंपरी-चिंचवड़ और चेन्नई जैसे ऑटोमोटिव हबों में इस दर्द को महसूस किया जा सकता है। असर इससे संबंधित उद्योगों पर भी है। अधिक चिंता ट्रक उत्पादन में मंदी से है, जो माल और आवश्यक वस्तुओं की धीमी मांग का स्पष्ट संकेत है। समग्र मंदी ने सेवा क्षेत्र को भी प्रभावित किया है। पिछले कुछ समय से रियल एस्टेट सेक्टर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पा रहा है, जिससे ईंट, स्टील व इलेक्ट्रिकल्स जैसे संबद्ध उद्योग भी प्रभावित हो रहे हैं। कोयला, कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के उत्पादन में गिरावट के बाद कोर सेक्टर धीमा हो गया है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था फसल की अपर्याप्त कीमतों से ग्रस्त है। 2017-18 में बेरोजगारी 45 साल के उच्च स्तर पर रही। आर्थिक विकास बढ़ाने का विश्वसनीय इंजन रही खपत, 18 महीने के निचले स्तर तक पहुंच गई है। बिस्कुट के पांच रुपए के पैकेट की बिक्री में गिरावट ने सारी कहानी खुद बयां कर दी हैा। उपभोक्ता ऋण की सीमित उपलब्धता और घरेलू बचत में गिरावट से खपत भी प्रभावित होती है।
मेरे अनुमान में, इस मंदी से बाहर आने में कुछ साल लगेंगे बशर्ते सरकार अभी समझदारी से काम ले। हालांकि हम यह न भूलें कि नोटबंदी की भयंकर गलती के बाद जीएसटी के दोषपूर्ण अमल ने इस मंदी को जन्म दिया। आरबीआई ने हाल ही में ऐसे आंकड़े पेश किए हैं, जिनसे पता चलता है कि उपभोक्ता वस्तुओं के ऋणों के लिए सकल बैंक जोखिम में 2016 के अंत अर्थात नोटबंदी के बाद से लगातार गिरावट हुई है। इस डेटा से अर्थव्यवस्था की मांग संबंधी समस्याएं प्रदर्शित होती हैं।
आप लगातार कहते रहे हैं कि नोटबंदी व त्रुटिपूर्ण जीएसटी मौजूदा संकट के मुख्य कारण हैं। पूर्व मुख्य स्टैटिस्टिशियन प्रणब सेन भी एक साक्षात्कार में इससे सहमत थे। आपकी नजर में नोटबंदी व जीएसटी का अर्थव्यवस्था पर कुल प्रभाव क्या रहा? दोनों ने उद्यमिता व रोजगार को किस तरह प्रभावित किया?
-हां, वे सही है। यह नकदी की कमी के कारण उत्पन्न संकट है। भारत में पर्याप्त अनौपचारिक अर्थव्यवस्था है जो नकदी पर चलती है। इसके बड़े हिस्से में वैध गतिविधियां शामिल हैं, जो कर सीमा के दायरे से बाहर हैं और इसलिए इन्हें 'काली' अर्थव्यवस्था का हिस्सा नहीं मानना चाहिए। मसलन, कृषि क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 15% है, जो मुख्य रूप से नकदी पर चलती है और ज्यादातर कर-मुक्त है। यह नोटबंदी के दौरान सिस्टम से नकदी गायब होने से प्रभावित हुई थी। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) ने बताया कि नोटबंदी के ठीक बाद जनवरी-अप्रैल 2017 के दौरान असंगठित क्षेत्र में डेढ करोड़ नौकरियां खत्म हो गईं। इसके बड़ी संख्या में लोग गांवों में लौट गए और मनरेगा के काम की मांग में काफी वृद्धि हुई। जब तत्कालीन वित्त मंत्री ने मनरेगा को रिकॉर्ड बजट आवंटन की बात की, तो यह गहरे ग्रामीण संकट की स्वीकृति थी। हमने हाल ही में देखा कि कार्पोरेट निवेश जीडीपी के 7.5% से गिरकर सकल घरेलू उत्पाद का केवल 2.7% हो गया। यह 2010-11 में सकल घरेलू उत्पाद के 15% के रूप में उच्च स्तर पर था। जाहिर है नोटबंदी के प्रभाव से संगठित क्षेत्र भी नहीं बचे। एक तरफ जहां नोटबंदी असर काफी वक्त तक कायम था, वहीं सरकार ने जीएसटी को इतनी जल्दबाजी में पेश किया कि इसने अर्थव्यवस्था को एक और बड़ा झटका दे दिया। हम जीएसटी के समर्थक हैं। हालांकि, इसे खराब तरीके से लागू किया गया। उदाहरण के लिए, एमएसएमई से सोर्सिंग भी प्रभावित हुई क्योंकि बड़ी कंपनियां उन आपूर्तिकर्ताओं से खरीद करना पसंद करती थीं, जो जीएसटी रसीद प्रदान कर सकते थे। अन्य मामलों में, आयात को उन छोटी भारतीय कंपनियों से सोर्सिंग पर प्राथमिकता दी गई, जो जीएसटी के दायरे में मुश्किल से ही आ पा रहीं थीं। इससे पूरी आपूर्ति शृंखला बाधित हो गई और चीनी आयातों की हमारे बाजारों में बाढ़ आ गई है। कई स्लैब वाले जीएसटी ढांचे, दरों में लगातार कटौती और नियमों के बदलने ने छोटे और मध्यम व्यवसायों को भी चोट पहुंचाई है।
एक तरफ, सरकार ने बैंकों से उपभोक्ताओं और उद्यमियों को विकास को बढ़ावा देने के लिए ऋण देने का आग्रह किया है, दूसरी ओर इसने बैंक विलय को मंजूरी दे दी है। क्या बैंक विलय से बैंकिंग क्षेत्र की समस्याओं का समाधान होगा?
-सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का विलय, बैंकिंग क्षेत्र को सुव्यवस्थित और मजबूत बनाने में मदद कर सकता है। लेकिन क्या इसके लिए यह सही समय है? समय की जरूरत है कि नकदी के प्रवाह को सुगम बनाया जाए और नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स की चुनौती को दूर किया जाए। इन पर अपना ध्यान केंद्रित करने के बजाय केवल विलय से बैंकरों का ध्यान एकीकरण की चुनौतियों पर ही केंद्रित हो सकता है। विलय की प्रक्रिया काफी जटिल होती है। हमारे बैंकों को उनके संक्रमण काल के दौरान सहायता करने के लिए किसी भी रणनीतिक योजना की कमी इस समस्या को और बढ़ाएगी। सरकार इस धारणा पर भी भरोसा कर रही है कि कमज़ोर बैंकों का मज़बूत बैंकों में विलय करके कमियां दूर करके बड़े और मज़बूत बैंक बनाएंगे। लेकिन यह उतना ही संभव है कि कमजोर बैंक, मजबूत बैंकों को भी अपनी ओर खींच लेंे, क्योंकि उनके पास कमजोर बैलेंस शीट हैं। वास्तव में कुछ बड़े बैंक खुद एक कमजोर क्रेडिट प्रोफाइल का अनुभव कर रहे हैं। विलय के लिए चुने गए बैंकों में से एक वर्तमान में प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन फ्रेमवर्क के अंतर्गत है और एक अन्य को हाल ही में इस साल फरवरी में हटा दिया गया था। इन बैंकों की कमजोरियां अब एंकर बैंक तक बढ़ जाएंगी। हमने अभी तक 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के सभी सबकों को नहीं सीखा है। सरकार उन संरचनात्मक मुद्दों के समाधान की पहल में भी विफल रही है जो सार्वजनिक बैंकिंग क्षेत्र में समस्याओं का सामना कर रहे हैं।
क्या कांग्रेस रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभा पाई?
-बिल्कुल, पूर्ण रूप से। हम जहां तक भी जरूरत है, वहां तक पहुंचने और सहायता प्रदान करने की नीति पर चल रहे हैं। राहुल गांधी ने सरकार से अनुरोध किया कि सरकार जल्दबाजी में जीएसटी लागू न करे। हमने सरकार से टैक्स स्लैब और जीएसटी संरचना को तर्कसंगत बनाने का अनुरोध किया। हर मंच से, आर्थिक वास्तविकता से सरकार को अवगत कराने और रचनात्मक समाधान पेश करने का हमारा निरंतर प्रयास था। आखिरकार सरकार ने हमारे कई सुझावों को मान भी लिया। जब सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून जैसे महत्वपूर्ण जन-हितैषी उपायों को उलटने की कोशिश की, तो हम अपने कड़े स्टैंड पर अडिग हो गए और सरकार को आखिरकार हमारे रुख का लाभ समझ में आया। यह भी याद रखना चाहिए कि जीएसटी जैसे कई कार्यक्रम हमारे विचार थे जिनका पहले भाजपा द्वारा विरोध किया गया था। इनमें गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी भी शामिल थे। प्रधानमंत्री ने संसद में मनरेगा की भी जमकर आलोचना की, लेकिन अब, यह देखते हुए कि सामाजिक सुरक्षा जाल के रूप में यह कितना महत्वपूर्ण है, सरकार ने इसके लिए काफी रकम आवंटित की है।
एक ओर हम मोदी-2 शासन के पहले 100 दिन की उपलब्धियों का प्रचार अभियान देख रहे हैं तो दूसरी ओर आपने देश की अर्थव्यवस्था को गहरी चिंता का विषय बताया है। क्या स्थिति वास्तव में इतनी गंभीर है? इस आर्थिक मंदी से बाहर आने में कितना समय लगेगा?
-अपने काम पर बात करना मोदी सरकार का विशेषाधिकार है, लेकिन सरकार अब अर्थव्यवस्था के बारे में इनकार की मुद्रा में नहीं रह सकती। भारत बहुत चिंताजनक आर्थिक मंदी में है। पिछली तिमाही की 5% जीडीपी विकास दर 6 वर्षों में सबसे कम है। नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ भी 15 साल के निचले स्तर पर है। अर्थव्यवस्था के कई प्रमुख क्षेत्रों को प्रभावित हुए हैं। ऑटोमोटिव सेक्टर उत्पादन में भारी गिरावट से संकट में है। साढ़े तीन लाख से ज्यादा नौकरियां जा चुकी हैं। मानेसर, पिंपरी-चिंचवड़ और चेन्नई जैसे ऑटोमोटिव हबों में इस दर्द को महसूस किया जा सकता है। असर इससे संबंधित उद्योगों पर भी है। अधिक चिंता ट्रक उत्पादन में मंदी से है, जो माल और आवश्यक वस्तुओं की धीमी मांग का स्पष्ट संकेत है। समग्र मंदी ने सेवा क्षेत्र को भी प्रभावित किया है। पिछले कुछ समय से रियल एस्टेट सेक्टर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पा रहा है, जिससे ईंट, स्टील व इलेक्ट्रिकल्स जैसे संबद्ध उद्योग भी प्रभावित हो रहे हैं। कोयला, कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के उत्पादन में गिरावट के बाद कोर सेक्टर धीमा हो गया है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था फसल की अपर्याप्त कीमतों से ग्रस्त है। 2017-18 में बेरोजगारी 45 साल के उच्च स्तर पर रही। आर्थिक विकास बढ़ाने का विश्वसनीय इंजन रही खपत, 18 महीने के निचले स्तर तक पहुंच गई है। बिस्कुट के पांच रुपए के पैकेट की बिक्री में गिरावट ने सारी कहानी खुद बयां कर दी हैा। उपभोक्ता ऋण की सीमित उपलब्धता और घरेलू बचत में गिरावट से खपत भी प्रभावित होती है।
मेरे अनुमान में, इस मंदी से बाहर आने में कुछ साल लगेंगे बशर्ते सरकार अभी समझदारी से काम ले। हालांकि हम यह न भूलें कि नोटबंदी की भयंकर गलती के बाद जीएसटी के दोषपूर्ण अमल ने इस मंदी को जन्म दिया। आरबीआई ने हाल ही में ऐसे आंकड़े पेश किए हैं, जिनसे पता चलता है कि उपभोक्ता वस्तुओं के ऋणों के लिए सकल बैंक जोखिम में 2016 के अंत अर्थात नोटबंदी के बाद से लगातार गिरावट हुई है। इस डेटा से अर्थव्यवस्था की मांग संबंधी समस्याएं प्रदर्शित होती हैं।
आप लगातार कहते रहे हैं कि नोटबंदी व त्रुटिपूर्ण जीएसटी मौजूदा संकट के मुख्य कारण हैं। पूर्व मुख्य स्टैटिस्टिशियन प्रणब सेन भी एक साक्षात्कार में इससे सहमत थे। आपकी नजर में नोटबंदी व जीएसटी का अर्थव्यवस्था पर कुल प्रभाव क्या रहा? दोनों ने उद्यमिता व रोजगार को किस तरह प्रभावित किया?
-हां, वे सही है। यह नकदी की कमी के कारण उत्पन्न संकट है। भारत में पर्याप्त अनौपचारिक अर्थव्यवस्था है जो नकदी पर चलती है। इसके बड़े हिस्से में वैध गतिविधियां शामिल हैं, जो कर सीमा के दायरे से बाहर हैं और इसलिए इन्हें 'काली' अर्थव्यवस्था का हिस्सा नहीं मानना चाहिए। मसलन, कृषि क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 15% है, जो मुख्य रूप से नकदी पर चलती है और ज्यादातर कर-मुक्त है। यह नोटबंदी के दौरान सिस्टम से नकदी गायब होने से प्रभावित हुई थी। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) ने बताया कि नोटबंदी के ठीक बाद जनवरी-अप्रैल 2017 के दौरान असंगठित क्षेत्र में डेढ करोड़ नौकरियां खत्म हो गईं। इसके बड़ी संख्या में लोग गांवों में लौट गए और मनरेगा के काम की मांग में काफी वृद्धि हुई। जब तत्कालीन वित्त मंत्री ने मनरेगा को रिकॉर्ड बजट आवंटन की बात की, तो यह गहरे ग्रामीण संकट की स्वीकृति थी। हमने हाल ही में देखा कि कार्पोरेट निवेश जीडीपी के 7.5% से गिरकर सकल घरेलू उत्पाद का केवल 2.7% हो गया। यह 2010-11 में सकल घरेलू उत्पाद के 15% के रूप में उच्च स्तर पर था। जाहिर है नोटबंदी के प्रभाव से संगठित क्षेत्र भी नहीं बचे। एक तरफ जहां नोटबंदी असर काफी वक्त तक कायम था, वहीं सरकार ने जीएसटी को इतनी जल्दबाजी में पेश किया कि इसने अर्थव्यवस्था को एक और बड़ा झटका दे दिया। हम जीएसटी के समर्थक हैं। हालांकि, इसे खराब तरीके से लागू किया गया। उदाहरण के लिए, एमएसएमई से सोर्सिंग भी प्रभावित हुई क्योंकि बड़ी कंपनियां उन आपूर्तिकर्ताओं से खरीद करना पसंद करती थीं, जो जीएसटी रसीद प्रदान कर सकते थे। अन्य मामलों में, आयात को उन छोटी भारतीय कंपनियों से सोर्सिंग पर प्राथमिकता दी गई, जो जीएसटी के दायरे में मुश्किल से ही आ पा रहीं थीं। इससे पूरी आपूर्ति शृंखला बाधित हो गई और चीनी आयातों की हमारे बाजारों में बाढ़ आ गई है। कई स्लैब वाले जीएसटी ढांचे, दरों में लगातार कटौती और नियमों के बदलने ने छोटे और मध्यम व्यवसायों को भी चोट पहुंचाई है।
एक तरफ, सरकार ने बैंकों से उपभोक्ताओं और उद्यमियों को विकास को बढ़ावा देने के लिए ऋण देने का आग्रह किया है, दूसरी ओर इसने बैंक विलय को मंजूरी दे दी है। क्या बैंक विलय से बैंकिंग क्षेत्र की समस्याओं का समाधान होगा?
-सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का विलय, बैंकिंग क्षेत्र को सुव्यवस्थित और मजबूत बनाने में मदद कर सकता है। लेकिन क्या इसके लिए यह सही समय है? समय की जरूरत है कि नकदी के प्रवाह को सुगम बनाया जाए और नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स की चुनौती को दूर किया जाए। इन पर अपना ध्यान केंद्रित करने के बजाय केवल विलय से बैंकरों का ध्यान एकीकरण की चुनौतियों पर ही केंद्रित हो सकता है। विलय की प्रक्रिया काफी जटिल होती है। हमारे बैंकों को उनके संक्रमण काल के दौरान सहायता करने के लिए किसी भी रणनीतिक योजना की कमी इस समस्या को और बढ़ाएगी। सरकार इस धारणा पर भी भरोसा कर रही है कि कमज़ोर बैंकों का मज़बूत बैंकों में विलय करके कमियां दूर करके बड़े और मज़बूत बैंक बनाएंगे। लेकिन यह उतना ही संभव है कि कमजोर बैंक, मजबूत बैंकों को भी अपनी ओर खींच लेंे, क्योंकि उनके पास कमजोर बैलेंस शीट हैं। वास्तव में कुछ बड़े बैंक खुद एक कमजोर क्रेडिट प्रोफाइल का अनुभव कर रहे हैं। विलय के लिए चुने गए बैंकों में से एक वर्तमान में प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन फ्रेमवर्क के अंतर्गत है और एक अन्य को हाल ही में इस साल फरवरी में हटा दिया गया था। इन बैंकों की कमजोरियां अब एंकर बैंक तक बढ़ जाएंगी। हमने अभी तक 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के सभी सबकों को नहीं सीखा है। सरकार उन संरचनात्मक मुद्दों के समाधान की पहल में भी विफल रही है जो सार्वजनिक बैंकिंग क्षेत्र में समस्याओं का सामना कर रहे हैं।
क्या कांग्रेस रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभा पाई?
-बिल्कुल, पूर्ण रूप से। हम जहां तक भी जरूरत है, वहां तक पहुंचने और सहायता प्रदान करने की नीति पर चल रहे हैं। राहुल गांधी ने सरकार से अनुरोध किया कि सरकार जल्दबाजी में जीएसटी लागू न करे। हमने सरकार से टैक्स स्लैब और जीएसटी संरचना को तर्कसंगत बनाने का अनुरोध किया। हर मंच से, आर्थिक वास्तविकता से सरकार को अवगत कराने और रचनात्मक समाधान पेश करने का हमारा निरंतर प्रयास था। आखिरकार सरकार ने हमारे कई सुझावों को मान भी लिया। जब सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून जैसे महत्वपूर्ण जन-हितैषी उपायों को उलटने की कोशिश की, तो हम अपने कड़े स्टैंड पर अडिग हो गए और सरकार को आखिरकार हमारे रुख का लाभ समझ में आया। यह भी याद रखना चाहिए कि जीएसटी जैसे कई कार्यक्रम हमारे विचार थे जिनका पहले भाजपा द्वारा विरोध किया गया था। इनमें गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी भी शामिल थे। प्रधानमंत्री ने संसद में मनरेगा की भी जमकर आलोचना की, लेकिन अब, यह देखते हुए कि सामाजिक सुरक्षा जाल के रूप में यह कितना महत्वपूर्ण है, सरकार ने इसके लिए काफी रकम आवंटित की है

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