राष्ट्रीय

चंद्रयान-2 की असफलता बनी जीवन-जीने की राह - ’’ रख हौंसला, वो मंजर भी आयेगा ।

चंद्रयान-2 की असफलता बनी जीवन-जीने की राह - ’’ रख हौंसला, वो मंजर भी आयेगा ।

चंद्रयान-2 के लैंडर विक्रम की चन्द्रमा की सतह पर उतरने से कुछ ही समय पहले भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ’’इसरो’’ से संपर्क टूटने पर प्रधानमंत्री का ब्यान कि ’’सम्पर्क टूटा है, हौंसला नहीं ’’ या स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर का यह ट्वीट कि ’’ सम्पर्क टूटा है, संकल्प नहीं’’ बहुत कुछ सोचने को दे गया । सारे राष्ट्र को एकता के सूत्र में बांध दिया, क्या सत्ता पक्ष या विपक्ष, सीने जगत की महान हस्तियों तथा खेलजगत के जाने माने लोगों ने, सबने निराशा की इस घड़ी को आशा में बदल दिया । किसीे ने इसे असफलता नहीं, सीख कहा, तो किसी ने ’’सफलता-असफलता तो आती-जाती रहती है, लेकिन सफल होने का दृढ़ संकल्प सदा चलते रहना चाहिए ’’ । ’’ ख्वाब अधूरा रहा, पर हौंसला जिंदा है’’ वहां मुश्किले शर्मिंदा है, हम होंगे कामयाब’’ इत्यादि । राष्ट्रीय स्तर पर इस असफलता को कैसे हैंडिल किया गया तथा लोग कैसे इसरो के साथ खड़े नजर आये, ये हमें जीवन के दर्शन के बारे में बहुत कुछ सीखने के लिए दे गया । आशा-निराशा, सुख-दुख, सफलता-विफलता, धूप-छांव में जीवन बहता रहता है, प्रश्न उसमें जीवन्तता को बनाए रखने का हैं । हालांकि इसरो के चेयरमैन जब प्रधानमंत्री के कंधे पर फफक-फफक कर रोये तथा प्रधानमंत्री ने ढाढस बंधाया तो लगा कि कैसे व्यक्ति, चाहे वह मधन वैज्ञानिक हो या कोई बहुत बड़ी शख्सीयत, दुख और निराशा के क्षणों में कैसी निरीह व विशादयुक्त हो जाती है । भगवान श्री कृष्ण ने जब अर्जुन के विशाद को दूर करने के लिए जो गीता सुनाई, उसमें भी दुख को कैसे विशादयोग बना दिया अर्थात असफलता का दुख एक नयी सफलता की शुरूआत करने का अवसर प्रदान करता है । ’’ सम्पर्क टूटा है संकल्प नहीं ’’ ये वाक्य मेरे जहन में बार बार गूंज रहा है, काश हम दैनिक जीवन में भी ये प्ररेणा युक्त शक्तिशाली वाक्य प्रयोग करते नजर आते । लेकिन जीवन में तो उल्टा चल रहा है, सम्पर्क बना हुआ है, संकल्प नहीं नजर आता, चाहे वह रिश्तों की बात हो या जीवन जीने का मुद्दा हो । हम सब जी तो रहे है, अर्थात जीवन से सम्पर्क तो हैं, क्या हम ’’शिवसंकल्प’’ शुभ संकल्प’’ के साथ जीवन जी रहे हैं । अभिव्यक्त करना तथा अनुभव करना, यही जीवन्तता के लक्षण है, पर क्या हम दृढ़ संकल्पता से अपने अंदर छिपी प्रतिभा व शक्तियों को अभिव्यक्त कर रहे हैं तथा अपने सपनों को अमली जामा पहना रहे हैं । यह सोचने का विषय है । ठीक इसी तरह, आज जो संबध निर्वाह हम कर रहे हैं, वो सम्पर्क सूत्र ज्यादा है, उनमें जो अपनेपन की महक तथा एक दूसरे के साथ निभने, आपसी समझ, मेलजोल की जो खुशी तथा आत्मीयता टपकती थी, वो आज रिश्तों से गायब है । मनुष्य एक समाजिक प्राणी है, भूख प्यास आदि शारीरिक आवश्यकताओं के साथ उसके अंदर संबध बनाने - अर्थात एफिलियेशन नीड भी उसकी महŸाी, तथा मूलभूत आवश्यकता है, इसी मानवीय आवश्यकता पर ही तो परिवार और समाज यहां तक की राष्ट्र की विचारधारा टिकी है । ये भावनाए इतनी बलशाली होती है कि इन्हें भाषा की भी जरूरत नहीं होती, आप बिना संवाद किए भी, बहुत कुछ कह सकत हैं, अनुभव कर सकते हैं । लेकिन आज डिजिटल आभासी दुनिया में संपर्क तो बढता जा रहा है, संबध गायब हो रहे हैं ,सूचनाओं का आदान प्रदान बढ रहा है, पर परस्पर सार्थक संवाद घट रहा है । मनुष्य की मनुष्य पर निर्भरता कम हो रही है, पर सुख संसाधन व सुविधाओं पर निर्भरता बढ़ती जा रही है । जीवन में जो कुछ चेतन है, उसकी अनुभूति व निकटता कम हो रही है और जो भी ’’जड़ वस्तुए हैं, उनकी हमारे चारों और भरमार है तथा वे हमारे दिलोदिमाग पर काबिज हो रहे हैं । जीवन को उसकी संपूर्ण समंग्रता से समझना व जीना होगा तथामानव को सच्ची खुशी व आनंद मिल सकता है । वापिस लौटते हैं चंद्रयान-2 के प्रसंग पर, जिसकी असफलता ने ही न केवल सबको एक भावना एक सूत्र में बांधा अपितु इस तरह से सोचने का मौका भी दिया । यहां एडमंड हिलेरी के कथन जोकि उन्होंने एवरेस्ट पर न पहुंचने की असफलता पर कहे थे ’’ मैं अगली बार फिर आउंगा और विजय पाउंगा, क्योंकि एवरैस्ट तुम जड़ हो, बिकसित नहीं हो सकते, पर मैं मानव हूं, चेतन हूं, विकसित हो सकता हूं’’। इसी ललकार ने अगली बार उन्हें एवरेस्ट पर विजय दिलाई, इतिहास में उनका नाम स्वर्ग अक्षरों में लिखवा दिया । अंत में ’’ परिंदो को नहीं दी जाती तालीम उड़ानों की, वे खुद ही तय करते हैं मंजिल आसमानों की, रखते हैं वो हौंसला आसमान को छूने का, इनकों नहीं होती परवाह गिर जाने की । डा0 क. कलि

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