राष्ट्रीय

सुप्रीम कोर्ट की सरकारी खर्चों पर नसीहत

सुप्रीम कोर्ट की सरकारी खर्चों पर नसीहत

 

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार की काफी खिंचाई की, जिसमें उन्होंने दिल्ली सरकार द्वारा मैट्रो में औरतों को मुफ्त यात्रा के प्रस्ताव के वित्तीय पहलुओं को मद्देनजर रखते न केवल सरकार को अपने खर्चों पर अंकुश रखने को कहा, अपितु सार्वजनिक वित को इस प्रकार लुटाने से भी रोका तथा दिल्ली सरकार में मुख्यमंत्री केजरीवाल को हिदायत दी कि वो न्यायालय को कमजोर न समझे कि न्यायालय उन्हें ऐसा करने से रोक नहीं सकता। सरकारें कितना लापरवाह तथा अनुत्पादकीय खर्चों में वृद्धि करती जा रही है, यह वर्तमान सार्वजनिक वित व्यवस्था से देखा जा सकता है। इधर, चुनाव से पूर्व, क्योंकि फिर चुनाव संहिता लग जायेगी, सरकारें किस कदर करोड़ों रुपये जनसभाओं तथा मुख्यमंत्री के चेहरे वाले असंख्य विज्ञापनों पर पैसा पानी की तरह बहा रही है। आज विद्यमान सरकारें, आने वाले चुनावों से पहले अपनी छवि लोकप्रिय बनाने के लिये जनहित के नाम पर, करदाताओं के पैसों को, फ्री बायस या मुफ्त सुविधाओं को प्रदान करने पर खर्च करती रहती हैं, जिनमें भ्रष्टता का बोलबाला होता है। अन्तिम व्यक्ति तथा जिसको ये मुफ्त सुविधायें मिलनी चाहिये, वहां तक तो पहुंचती ही नही हैं। सरकारें आजकल उत्पादकीय कार्यों पर तो खर्च करती ही नहीं है, उनका ज्यादा खर्च तो स्वयं पर, सरकार की भारी भरकम व्यवस्था को चलाने में ही हो जाता है, बाकी थोड़ा सा चुनावी लुभावने मनमोहक प्रस्तावों के विज्ञापनों तथा जनता में मुफ्तखोरी की आदत बनाने में चला जाता है।

सरकारें, कर्मचारी जोकि दिन-रात कार्य करते हैं, मेहनत करते हैं, अपनी जवानी का समय व पसीना अपनी नौकरी करने में बहाते हैं, उनकी तो पेंशन बंद कर दी गई है, पर सामाजिक न्याय के नाम पर असंख्य तरह की पेंशनें शुरू कर दी गई हैं, जैसे अखबार नवीसो के लिये सम्मान पेंशन, हिन्दी आन्दोलन करने वालों के लिये पेंशन, आदि। सरकार यदि कर बढ़ाती है तो उसपर सबका ध्यान जाता है, जनता जागरूक रहती है, पर सरकारें करदाता के पैसे का कैसे खर्च करती है, इस पर लोग ज्यादा प्रश्न नहीं उठाते, जबकि पब्लिक वित्त व्यवस्था में आय जितनी महत्वपूर्ण होती है, व्यय उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि सरकारें पहले अपने खर्चों का अनुमान व बजट बनाती हैं, उसे पूरा करने के लिये करों तथा अन्य टैक्स के रूप में आय उपार्जित करती हैं। निजीकरण और उदारीकरण के इस दौर में सरकार निवेश, रोजगार तथा उत्पादन के लिये निजी क्षेत्र को जिम्मेवार ठहरा रही हैं, पर जब सरकारें कोई उत्पादकीय कार्य नहीं कर रही हैं तो उनके आकार तथा उनके खर्चों में तो कटौती होनी चाहिये। न अब सरकारें सड़कें बनाती हैं, न स्कूल खोलती हैं, न अस्पताल बढ़ रहे हैं, सब कुछ निजी क्षेत्र को सौंपा जा रहा है, पर सरकारों के खर्चों में कोई कमी नहीं आ रही। जिम्मेवारियां घटाकर अन्य प्रकार के फिजूल के खर्चों में वृद्धि करती जा रही हैं। आज सरकार हर कार्य के लिये हर नये कार्यक्रम के लिये नया कर लगाती है, स्वच्छ भारत अभियान हो या शिक्षा के लिये प्रावधान हो, सबके लिये पृथक टैक्स या सैस लगाये जा रहे हैं, जनता पर सरकारी भारी व्यवस्था का बोझ लगातार बढ़ रहा है, जबकि भारत जैसे देश में उद्योगपति, नियोक्ता या बड़े-बड़े उद्यमी, इतने उदारवादी नहीं हैं कि वे ये उद्योग धंधे पब्लिक के लिये चलाते हैं। उनकी मुनाफाखोरी तथा कर्मचारियों का शोषण किसी से छिपा नहीं है। सामाजिक न्याय तथा जनहित के कार्यक्रमों की अपेक्षा, उनका धन दिखावे के लिये जैसेकि मंहगी-मंहगी शादियां तथा अपने लिये बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं के निर्माण तथा विलासितापूर्ण चीजों में ज्यादा खर्च करते हैं। ऐसे में सरकारों से उम्मीद करना कि वे अपना खर्च किफायत तथा उत्पादकीय कार्यों में करेंगे, मूर्खता ही समझी जायेगी। दिल्ली सरकार का मैट्रो पर स्त्रियों को मुफ्त यात्रा के प्रावधान का प्रस्ताव, सामाजिक न्याय तथा समानता के अवसर बढ़ाने की तरफ कदम हो भी सकता है, लोकलुभावन पापुलिस्ट कदम कहा जा सकता है, पर सरकारों द्वारा किये जाने वाले अनुत्पादकीय खर्चे तथा करदाताओं के पैसे को फिजूल, निमर्म ढंग से बहाया जाना चिंता का विषय है। जागरूक नागरिक को उस पर प्रश्नचिन्ह लगाना चाहिये कि कैसे मंत्री, संतरी, अफसर के अगाड़ी और पिछाड़ी चलने वालों पर कैसे और कितना खर्च किया जाता है।

अर्थव्यवस्था इस समय, जिस मंदी के हालात से गुजर रही है, बाजार गोते खा रहा है, रोजगार अवसर उपलब्ध नहीं है, बेरोजगारों की कतारें दिन-प्रतिदिन लम्बी होती जा रही है, ऐसे में सरकारों की नैतिक जिम्मेदारी भी बनती है कि वे अपने अनुत्पादकीय खर्च घटाकर, उत्पादकीय निवेश करें, जिससे अर्थव्यवस्था कुछ चुस्ती की गति पकड़े। अंत में, दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां -

‘‘चाहे जो भी फसल उगा ले, तू जलधार बहाता चल,

जिसका भी घर चमक उठे, तु मुफ्त प्रकाश लुटाता चल,

रोक नहीं अपने अंतर का वेग, किसी आशंका में,

मन में उठे भाव जो, उनको गीता बनाकर गाता चल।’’

        डा0 क. कली

 

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