राष्ट्रीय

‘‘जाने कहां गये वो दिन - टीचर्स डे पर विशेष’’

 ‘‘जाने कहां गये वो दिन - टीचर्स डे पर विशेष’’

 
आज टीचर्स डे पर, टीचर्स का क्या सम्मान होता था, समाज में उनका रुतबा क्या था, एक अध्यापक बच्चों को कैसे पुष्पित, पल्लवित, सुसंस्कृत, परिष्कृत कर सकता था, उसके संदर्भ में मुझे लिंकन, जो अमेरिका के राष्ट्रपति थे, उन्होंने अपने बच्चे को जब स्कूल भेजा तो उन्होंने जो पत्र टीचर के नाम लिखा, उसकी सहज स्मृति मेरे ज़हन में आ गई। कितनी विनय और ईमानदारी से टीचर से उसे अच्छा इंसान बनाने की गुजारिश करते हैं। वो उसमें कहते हैं कि मेरे बच्चे को सिखाना कि हर शत्रु में एक मित्र छिपा होता है, हर इंसान न्यायप्रिय तथा सच्चा नहीं होता, पर उसे न्यायप्रिय और सच्चा बनना सिखाना। उसे बताना कि अपने हाथ से कमाये गये 10 सैंट सड़क पर मिले डालर से श्रेयस्कर होते हैं। उसे पुस्तकों में छिपे रहस्यों और रोमांच से तो परिचित करवाना, पर प्रकृति के साथ समय बिताने तथा फैले आकाश को मापते पंछी, सूर्य तथा पहाड़ियों पर उगे फूल-पत्तों से भी अवगत कराना। भीड़ से कैसे अलग साहस पूर्वक चलना, अपने विश्वास तथा अपनी प्रतिभा को कैसे बढ़ाना, ऐसी बहुत सारी बातें, उन्होंने उस पत्र में अध्यापक को अपने बच्चे को सिखाने के लिये कही।
दूसरा उदाहरण, जो मेरी स्मृति में कौंध रहा है वो रवीन्द्रनाथ टैगोर का है। जब उन्हें शांति निकेतन की स्थापना करने की संकल्पना आई तो कैसे क्षितिमोहन सेन, जोकि काशी के जाने-माने विद्धान थे, उनके शील, साहित्य तथा आध्यात्मिक झुकाव को देखते हुए कितनी अनुनय से निवेदन कर उन्हें बुलाया और अपने सपने ‘‘शांति निकेतन’’ बनाने में शामिल किया। उन्होंने लिखा कि ‘‘मैं ऐसा प्रयास कर रहा हूं कि हमारे विद्यालय में हर अध्यापक अपनी क्षमता का स्वाधीन रूप से उपयोग करे ताकि विद्यालय अपना यांत्रिक भाव छोड़ एक जीवंत प्राणी जैसा भाव प्राप्त करे। आप भी इसमें प्राण संचार करके इसे भीतर की ओर से उन्मुक्त कर देंगे। हमारे विद्यालय में सत्य का अपमान न हो, छात्रगण जिससे सत्य को निभर्य होकर स्वीकार कर, अपने जीवन को धन्य कर सके, वही परम शक्ति हमें उनके भीतर संचार करनी होगी’’, ये सब बाते बीते जमाने की है, पर सत्य कभी बीतता नहीं है, वो तीनों कालों में बराबर बना रहता है, जबसे शिक्षा गुरु-शिष्य की परम्परा से निकल व्यवसाय तथा उद्योग बन गई, तब से शिक्षक के अधिकारों, कर्तव्यों, उसके स्थान तथा योगदान में भी परिवर्तन आता गया। अध्यापक चाहे प्राईमरी स्कूल का हो या विश्वविद्यालय का प्रोफैसर, उसका मूल कार्य तो छात्रों में ज्ञान की जोत जलाना है। भूमंडलीकरण तथा डिजिटलकरण के इस युग में आज सब टीचर्स के गुरु भी गुगलेश्वर महादेव बन गये है। डा0 राधाकृष्णन ने अपने जन्म दिवस को टीचर्स डे के रूप में मनाने की प्रेरणा देकर समाज में टीचर्स के सम्मान बढ़ाने का प्रयास किया। पर आज देशभर में विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में तदर्थ अस्थाई शिक्षक तथा गैस्ट टीचर्स सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है। वो अपने को नियमित करने, स्थाई करवाने के लिये राजनेताओं के झांसे में, वायदों में लगे रहते हैं, वहीं अध्यापकों की भर्ती पूर्णतयः जुगाड़ तंत्र की भेंट चढ़ गई है। विश्वगुरु बनने को ललायित भारत को पहले अपने देश में गुरुओं, आजकल के टीचर्स की गरिमा, सम्मान तथा उनके योगदान को समझते हुए शिक्षा नीति में बदलाव कर उन्हें स्कूलों, संस्थानों में रचनात्मक, बौद्धिक तथा व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करने व देशहित में योगदान में सक्षम बनाना होगा। अंत में, टीचर्स डे पर शुभकामनाओं के साथ शिक्षक क्या करता है, उसको बतलाती ये पंक्तियां -
‘‘ सुन्दर सुर बजाने का साज बनाता हूँ
नौ सिखिये पंरिदों को बाज बनाता हूँ
चुपचुाप सुनता हूँ शिकायतें सब की
तब भी दुनिया को बदलने की आवाज बनाता हूँ।
 
        डा0 क0कली
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