राष्ट्रीय

राजनीति में प्रतिशोध की गर्मी, अर्थव्यवस्था में नर्मी

राजनीति में प्रतिशोध की गर्मी, अर्थव्यवस्था में नर्मी

 
प्रतिशोध की राजनीति का दायरा विस्तृत होता जा रहा है। पहले छोटे नेता गली-मुहल्ले में इस सियासी तकनीक का प्रयोग धड़ल्ले से करते थे। धीरे-धीरे यह राज्यों में फैला, अब केन्द्र अर्थात राष्ट्रीय स्तर पर औछी बदले की भावना वाली राजनीति प्रचलन में देखी जा सकती है। पूछने वाले तो पूछ रहे हैं कि क्या केन्द्र में भी सरकार द्वारा तामिलनाडू छाप ‘बदले की राजनीति’ को अपनाया जा रहा है। जयललिता और करूणानिधि द्वारा एक-दूसरे पर सत्ता में आने पर जो दुश्मनी की हद तक बदले की कार्यवाही होती थी, जो शायद उनके शरीर छोड़े जाने के बाद ही खत्म होती दिखाई पड़ी, जबकि पहले ऐसा माना जाता रहा है कि राजनीति में न स्थाई मित्र होते हैं न ही स्थाई शत्रु। पर अब बदले की भावना से प्रेरित राजनीति जोकि राज्यों के स्तर तक पनपती दिखाई देती थी, अब राष्ट्रीय राजनैतिक चरित्र का हिस्सा बनती जा रही है। भाजपा ने जिस तरह से कांग्रेस के बड़े-बड़े नेताओं को हिरासत में लिया है या आरोप पत्र दाखिल हो रहे हैं, इससे तो स्पष्ट लगता है कि प्रतिशोध की राजनीति को नया मुकाम दिया जा रहा है। सरकारी एजेंसियों, केन्द्रीय जांच ब्यूरो, आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय, अदालती कार्यवाही, साथ ही साथ टेलीविजन चैनलों और सोशल मीडिया को मिलाकर, जो बदले की राजनीति को अंजाम दिया जा रहा है, उससे राजनैतिक नये समीकरण बनने तथा राजनैतिक वातावरण का रंग बदलता नजर आता है। 
सियासी मोर्चे पर बहुत ज्यादा बवाल उठ रहा है, उतना ही आर्थिक मोर्चे पर हाल-बेहाल हो रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री डा0 मनमनोहन सिंह ने भी आर्थिकी के प्रबंधन पर सरकार को चेताया है तथा सरकार को इस प्रतिशोध की राजनीति को छोड़ देश की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को संभालने को कहा है। पूर्व वित्त मंत्री पी सी चिंदबरम तो हिरासत में है ही, अब कर्नाटक कांग्रेस के बड़े नेता डी के शिवकुमार को भी हिरासत में ले लिया गया है तथा कांग्रेस के कई बड़े नेताओं, पूर्व मुख्यमंत्रियों तथा उनके करीबी लोगों पर आरोप पत्र दाखिल किये गये हैं। यह ठीक है कि राजनीति में फैली अनैतिकता तथा भ्रष्टाचार को खत्म करना सरकार की प्राथमिकता है, पर क्या सारे नेता जो कांग्रेस में हैं, वो भ्रष्ट हैं, जबकि भ्रष्टता को समाप्त करने की पहल भाजपा को अपने घर से ही करनी चाहिये थी। अपितु विपक्ष के भ्रष्ट राजनेताओं के सामने अब तो एक और विकल्प है कि या तो कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हो जाओ या फिर आयकर के छापों, ई डी के आरोप पत्रों तथा तिहाड़ जेल में जाने के लिये तैयार हो बैठो। ऐसा नहीं है कि पिछली सरकारों में ऐसा नहीं होता रहा है, सतासीन सरकारें विपक्ष को दबाने के लिये बदले की राजनीति करती रही है, पर अब भाजपा ने व्यापक स्तर पर तथा निशंक होकर धड़ल्ले से प्रतिशोध की राजनीति को जिस मुकाम पर पहुंचाया है, वो चिंता का विषय है। अर्थव्यवस्था में मंदी सैंसेक्स से होती हुई आम व्यक्ति तक पहुंच गई है। रुपया नौ महीने के निचले स्तर पर पहुंच गया है, शेयर बाजार में आये दिन कीमतों के गिरने से हाहाकार मचा होता है, बेरोजगारी युवाओं के लिये सबसे बड़ा सिरदर्द बन गई है, लेकिन सरकार है कि चुनाव जीतने को ही अपनी उपलब्धि मान इतरा रही है। यद्यपि अर्थशास्त्र का जन्म राजनीति शास्त्र के बाद हुआ, शुरू में इसे पोलिटिकल इक्नोमिक्स कहा जाता था, लेकिन अब अर्थशास्त्र राजनीति शास्त्र से बहुत आगे निकल गया है। राजनेता, आर्थिक मुद्दों को ज्यादा देर तक नजर अंदाज नहीं कर सकते। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी अपनी आर्थिक सफलताओं जोकि ‘‘गुजरात माडल’’ के रूप में जानी जाती है कि कैसे गुजरात का कायाकल्प किया, उसे भुनाकर राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने अपनी छवि बनाई थी। ‘‘अच्छे दिन’’ के नारे में भी आर्थिक विकास, जीडीपी, रोजगार का बढ़ना इत्यादि शामिल थे, पर राजनेता एवं देश किस आर्थिक संकट से जूझ रहा है, उससे बेखबर राजनैतिक प्रतिशोध की कार्यवाहियों में लगे हैं। बदले की भावना परपीड़न की भावना से प्रेरित राजनैतिक माहौल तो दूषित है ही, बढ़ती आर्थिक मंदी ने इसे ओर भी ककर्श बना दिया है।
अन्त में, राहत इन्दौरी की कुछ पंक्तियां -
‘‘अगर खिलाफ हंै तो होने दो, जान थोड़ी है,
यह सब धुआं है, आसमान थोड़ी ही है,
मैं जानता हूँ दुश्मन भी कम नहीं, 
लेकिन हमारी तरह हथेली पर जान थोड़ी है,
जो आज साहिबे मसनद हैं, कल नहीं होंगे,
किरायेदार हैं जाते मकान थोड़ी है,
सभी का खून शामिल है यहां की मिट्टी में,
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है।’’
 
        डा0 क0कली
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