राष्ट्रीय

सजाये और मनाये गणेश जी, बाहर पंडाल में भी और अन्तर्मन में भी

सजाये और मनाये गणेश जी,

बाहर पंडाल में भी और अन्तर्मन में भी
 
गणेश चतुर्थी का पर्व धार्मिक, सामाजिक व आध्यात्मिक महत्व बनाये हुए है। गजानन का स्वरूप न केवल भोले-भाले भक्तों के लिये आस्था का प्रतीक है, बल्कि वर्तमान काल में उनका स्वरूप गहन आध्यात्मिक चर्चा का भी विषय बनता जा रहा है। उनके नाम, चेहरा, उनका वाहन, उनके चारों हाथों में दिखाये जाने वाले कमल का फूल, पाश, मोदक तथा फरसा, उनकी बैठने की मुद्रा, सब को प्रतीक स्वरूप मान आधुनिक संदर्भ में प्रबन्ध विशेषज्ञों ने प्रबन्ध के सिद्वांतों को समझाने का प्रयास किया है। उनका स्वरूप सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक विरासत के गंभीर रहस्यों का समझने तथा कार्यरूप लाने में मदद करता है। मानव शरीर पर हाथी का मुख, यद्यपि उनको अजब-गजब का देवता बनाता है, वहीं कई प्राचीन हिन्दु संस्कृति के विकास की पराकाष्ठा अर्थात उस समय भी प्लास्टिक सर्जरी तथा अंगों के प्रत्यार्पण टांसप्लान्टेशन की जानकारी हमारे पूर्वजों को थी, उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत किया जाता है। हाथी बुद्विमता का प्रतीक माना जाता है, बड़ा सिर अर्थात विशाल बुद्धि। पशुत्व और मनुजता का बैलंस-देवत्व की ओर ले जाता है, ऐसा भी उनसे सीखा जा सकता है। उनके बड़े कान - ज्यादा सुनने, छोटी आंखें - बारीकियों को देखने, बड़ा पेट - छोटी बड़ी बातों को समाने की शक्ति तथा सूंड की लोचशीलता - जोकि एक छोटी सी सुई को भी जमीन से उठा सकती है, वहीं बड़े वृक्ष को भी उखाड़ फेंक सकती है, उनका वाहन चूहा - चंचलता, अनंत कभी न खत्म होने वाली इच्छाओं पर काबू पाने, क्योंकि वो गणेश जी के हाथ में दिखाये जाने वाले लड्डुओं के सामने भी शांत बैठा दिखाया जाता है। उनके एक हाथ में कमल कीचड़ में भी खिला रहना, अनासक्त प्रवृति का द्योतक है, दूसरे हाथ में पाश-रस्सी, पहले प्रेमरूपी रस्सी से बांध काम करवाओ, तीसरे हाथ में कुल्हाड़ी या फरसा, प्रेम से जो सिद्ध न हो सके, उसे भय से करवाओ अर्थात काट डालो, चैथे हाथ में मोदक - खुशी, सफलता एवं बधाई का प्रतीक है। उनको सर्वप्रथम पूज्य माना जाता है, क्योंकि वे ज्ञान-बुद्धि के देवता है। आज भी नाॅलेज इकोनमी में ज्ञान ही सबसे बड़ी शक्ति है। उनकी दो पत्नियां रिद्धि-सिद्धि अर्थात सिद्धि प्राप्त करनी है तो रीति से चलो अर्थात कोई कार्य विधिपूर्वक किया जाये तो ही सिद्ध होता है। उनके दो पुत्र शुभ व लाभ, जिनका अर्थ है कार्य का हेतु  - कल्याणकारी अर्थात शुभ होगा तो उसका परिणाम भी लाभ ही होगा।
इस प्रकार उनके स्वरूप में छिपे आध्यात्मिक रहस्यों की विवेकपूर्ण व्याख्या कर गणपति, विघ्नविनाशक, सिद्धिविनायक अनेक नामों से सम्बोधित होने तथा पूजे जाने का औचित्य सिद्ध किया जाता है। धर्म व आस्था तो इस पर्व का आधार ही है, लेकिन इसका सांस्कृतिक महत्व बाल गंगाधर तिलक ने जब स्वतन्त्रता के राजनैतिक आन्दोलन को लोगों से जोड़ने तथा उन्हें संगठित करने के लिये किया, तब से भी इसे सामुदायिक पर्व के रूप में मनाया जाने लगा है। संस्कृति का सुगठित विकास धर्म, इतिहास व जनजीवन से जुड़ा होता है। सांस्कृतिक मूल्य किसी भी राष्ट व किसी भी सभ्यता के विकास के लिये उर्जा का स्रोत्र होते हैं, इस संदर्भ में यह सामुदायिक पर्व जहां लोगों में उत्साह, उमंग का जोश भरता है, वहीं राष्टीय एकता के लिये भी अवसर प्रदान करता है।
महाराष्ट तथा आसपास यह त्योहार पूरे जोर-शोर से हर गली-मुहल्ले में पंडाल बनाकर बैंड-बाजे एवं नगाड़ों, भजन-गीत और सुन्दर-सुन्दर असंख्य तरह की गणेश जी की मूर्तियों की साज-सज्जा करके इस पर्व को अलग ही छटा प्रदान करते हैं। आम जनता से जुड़ा यह पर्व कई बार उसी आम व्यक्ति के जीवन में खलल भी पैदा करता है। बढ़ते प्रदूषण, शोरगुल, लम्बे-लम्बे टैफ्रिक जाम दैनिक जीवन को ओर भी दुष्कर बना देते हैं। इन सब छोटी-छोटी बातों को ध्यान में रख इस गणेश उत्सव का यथार्थ अर्थ समझ, उसमें छिपे मूल्यों व सत्य को आत्मसात कर मनाना चाहिये। केवल उपर से लकीर का फकीर न बन, दैवीय गुण, उनके चरित्र तथा आदर्श के सौंदर्य से प्रेरणा पाकर, व्यक्तिगत जीवन, सामुदायिक जीवन तथा राष्टीय स्तर पर सत्यम् शिवम् सुन्दरम् को चरितार्थ करना चाहिये। 
अन्त में, इस शुभकामना के साथ कि आपका सुख गणेश जी के पेट के समान बड़ा हो, आपकी जिंदगी उनकी सूंड जैसी लम्बी हो और आपके बोल उनके मोदक जैसे मीठे हों। 
 
 
        डा0 क. कली
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