राष्ट्रीय

लोकतंत्र में लोक शक्ति शुन्य

 

संक्रांति काल में व्यवस्थाओं में उथल पुथल होती है, पर व्यवस्थाओं और संस्थाओं की गरिमा और उनकी अस्मिता पर ही किसी देश , राज्य व समाज का ढांचा खड़ा रहता है, पर जिस तरह से खुले आम, खुल्लम-खुल्ला नियम, मर्यादाओं की अनदेखी, उन्हें तोड़ा-मरोड़ा व राजनैतिक हित के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, तथा सुद्यी जन व समाज का प्रबुद्ध वर्ग चुप है या उनकी सुनवाई ही नहीं है या वे देखते हुए भी नहीं देखते और सुनते हुए भी नहीं सुनते, ऐसा प्रतीत होता है । लोकतंत्र का अभिप्रायः ही लोगों की सक्रियता सहभागिता से होता है, फिर चाहे उसे विपक्ष की भूमिका कहे या मीडिया व प्रेस की स्वतंत्र अभिव्यक्ति कहें या चुने हुए संसद व एम.एल. ए. हो उनकी सरकार में दखल हो, पर देखने में यह आ रहा है कि सब सत्ता के पक्ष में खड़े सत्तासीन लोगों की झोलीचुक अर्थात उनकी हां में हां मिलाते नजर आते हैं । लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका तथा तंत्र में लोक का महत्व सर्वोपरि होता है अर्थात तंत्र-लोक नहीं लोकतंत्र नाम है: अर्थात तंत्र अपनी सारी शक्तियां लोगों से ग्रहण करता है, लोगों के लिए तथा लोगों के द्वारा ही उसका अस्तित्व टिका होता है, पर आज लोकतंत्र पर हावी है । हमारा संविधान कहता है - वी दा पीपल आफ इण्डिया - लोकिन आज गंगा उल्टी बह रही है। तंत्र तो सर्वशक्तिशली बना ही है, तंत्र की भी ऐसी की तैसी हो रही है और सरकारे भी निरंकुशता की हद तक तानाशाह रूप् ले रही है । प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री जोकि सत्तासीन पार्टी का नेता होता है, वह सारी षक्तिया पार्टी के सदस्यों से लेता है, क्योंकि उसका चुनाव सर्वसम्मिति से होता है, पर अब पार्टियोंका नेता, सुप्रीमों कहलाता है तथा पार्टी व उसके सदस्य,उससे षक्तियां ग्रहण करते हैं तथा उस पर निर्भर करते हैं । स्वभावतः नेता मेंषक्तियों का केन्द्रीयकरण होता है तो तानाशाह प्रवृत्तियां का उदय होता है । पार्टी नेताओं के आदमकद बड़े-बड़े कट-आउटस तथा अखबारों में पूरे पृश्ठ के विज्ञापन, जिनमें वे सरकार में हो रही छोटी-बड़ी योजना, उपलब्धियों को गिनाते नजर आते हैं, उससे ही लोकतंत्र में अधिनायकवाद की बढ़ती सड़ांद्य को देखा जा सकता है । पब्लिक मनी अर्थात करदाताओं का पैसा, जिससे कि ये भारी भरकम तं़त्र-अर्थात सरकार और उसकी संस्थाएं चलती है, आजकल तो लगता है यह तंत्र केवल पल रहा है, अर्थात तंत्र के द्वारा, तंत्र के लिए और तंत्र को समर्पित संस्थाओं की व्यवस्था बन गयी है । लोक तो लोकतंत्र में केवल नाम के लिए ही रह गया है वो भी केवल चुनावों के आने के समय, जब आप नेताओं से सुनते हैं िकवे तो लोक सेवक है, मिट्टी से जुड़े उनके जैसे है तथा उनका दुख-दर्द समझते हैं तथा इस आषय को वो बड़ी-बड़ी रैलियों व जनसभाओं में व उनके विज्ञापनों में व्यक्त करते हैं । काष वे इसी पैसे को ही किसी उत्पादकीय कार्य में लगाते, समाज में अन्तिम छोर पर खड़े व्यक्ति, जोकि उनकी इन जनसभाओं व रैलियों की षोभा बढ़ाते हैं, उनके लिए कुछ सार्थक कर पाते । लोक लुभावन वायदे तथा जनता के लिए अच्छे दिन आने के सपने दिखाने में माहिर राजनेताओं ने देष में राजनैतिक प्रणाली, जोकि लोकतंत्र कहने का है, उसे इस तरह से तरोड़-मरोड़ दिया है कि ’’डैमोक्रेसी’’ आज ’’डैमोनक्रेसी’’ बन गई है । भाजपा ने तो केवल कांग्रेस मुक्त भारत ही नहीं, अपितु विपक्षमुक्त भारत बना दिया है, जिसमें पब्लिक संस्थाओं को पंग्र बनाय जा रहा है तथा लोकतंात्रिक व्यवस्था चरमरा रही है । क्योंकि सत्ता का स्त्रोत लोक न होकर स्वयं सत्ता हो गयी है । सामुदायिक जीवन में उर्जाका स्त्रोत - समुदाय के लोग होते है, लोकतंत्र में उर्जा का स्त्रोत लोक कल्याण, लोगों का विकास व लोगों के जीवन से जुड़ा होता है, पर अब तंत्र हावी है वो भी ऐसा मूल्यविहीन तथा विचारधारा रहित, केवल अपने अस्तित्व से जूझ रहा है । अब लोग नागरिक नहीं है, जनता भी नहीं, केवल भीड़ है तथा लोकतंत्र भीड़तंत्र में परिवर्तित हो चुका है । निरंकुश ता की तरफ बढ़ते हुए इस लोकतंत्र में मनुष् श् व उसके हित गौण हो चुके है । अंत में रवीन्द्र प्रभात के षब्दों में ’’ मसलो से ग्रस्त है, जब आदमी इस दे श में, किस बात पर चर्चा हो,आज के परिवे श में, कल तक जो पोशक थे, आज पोशक बन गये, कौन करता है यकीन अब गांधी के दे श में, माहौल को अ अशांति कर, शांतिका उपदेश दें, घूमते है चोर - डाकू साधू के वेश में । डा0 क. कली

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