राष्ट्रीय

निर्मम प्रश्नाकुलता का समय - विपक्ष के लिये

23 मई के परिणामों के बाद जिस तरह से देश में विपक्ष का सफाया हुआ है, स्वस्थ, सशक्त तथा गतिशील प्रजातंत्र के लिये विपक्ष की भूमिका की अनिवार्यता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। प्रसिद्ध कहावत है, सत्ता भ्रष्ट करती है तथा बेलगाम सत्ता, भ्रष्टता का पर्याय बन जाती है। मोदी का जादु सिर चढ़ कर बोल रहा है, कहने को इस चुनाव परिणामों ने वंशवाद की राजनीति, जाति समीकरणों की राजनीति को नकार दिया है तथा एक नये प्रकार के राजनीतिक विमर्श को जन्म दिया है, जिसमें ‘‘मोदी है तो मुमकिन है’’ अर्थात नरेन्द्र मोदी लोगों के लिये ‘‘कुछ करने, कर गुजरने’’ तथा परफार्मेनस के प्रतीक बन कर उभरे हैं। देश में विपक्ष का लगभग पंगु होना चिंता का विषय है। लुटियनस देहली व खान मार्केट गैगंस तथा देश के एलीट वर्ग को मोदी ने विपक्ष माना तथा उन्हें हरा मासिज के नेता के रूप में अपने आप को स्थापित कर लिया है। पर प्रश्न एक प्रभावी तथा शक्तिशाली विपक्ष का है, इसके अभाव में सरकार की निरकुंशता तथा उसकी मनमानी बढ़ती जायेगी। 
लोकतंत्र में सरकारें बहुमत से बनती हैं पर चलती सर्वसम्मति से हैं। बहुमत वाली पार्टी सरकार बनाती है तथा सरकार चलाती है। अल्पमत वाली पार्टी यानी कि विपक्ष की भागेदारी भी महत्वपूर्ण होती है। वो देखती है कि सरकार जनता के हितों के लिये काम कर रही है। संविधान की भावना के अनुरूप नीतियां बनाई जा रही है तथा देश की संप्रभुता पर आंच तो नहीं आ रही है। लेकिन बुद्धिजीवी वर्ग तथा असहमति रखने वाले वर्ग को जिस तरह से अस्तित्वहीन तथा अशक्त किया जा रहा है, वह व्यथा तथा आंशका पैदा करने वाला है। मोदी जी अपने प्रोग्राम ‘‘मन की बात’’ के जरिये, जोकि एकतरफा संवाद है, उससे अपने को आम व्यक्ति से जोड़ते हैं, पर पूरे पांच वर्ष प्रैस कान्फ्रैंसिस, संवाददाता सम्मेलनों से कतराते रहे हैं, क्योंकि वहां असुविधाजनक प्रश्न पूछे जा सकते हैं। देश में जनतंत्र के चैथे पांव - स्वतंत्र प्रैस को किस तरह से सरकार का गुणगान करने वाले चारण व भाटों में परिवर्तित किया गया है, ये सभी जानते हैं। आज देश में ‘‘पिछला जो कुछ था झूठा है, अगला ही सिर्फ अनूठा है’’ की तर्ज पर राजनैतिक परिदृश्य में जो हो रहा है, वो ही अभूतपूर्व है। हावर्ड के स्थान पर हार्डवर्क की बात पहले हो चुकी है, अब राजनैतिक पंडितों की खिंचाई जारी है। 50-50 पृष्ठ के बायोडाटा वाले अर्थात शैक्षणिक उत्कृष्ठता वाले लोग, बुद्विजीवी जो देश, समाज व सरकार को अपने चिंतन से राह दिखाते व संस्कृति को समृद्ध करने का मादा रखते हैं, उनकी अनदेखी करना, उन्हें हाशिये पर पटकना, न ही देश के लिये न ही समाज के लिये उचित है। आवश्यकता है - विपक्ष  चाहे उसमें राजनैतिक विपक्ष है या सांस्कृतिक असहमति वाले लोग या संभ्रांत वर्ग यानी कि एलीट - एकजुट होने की अपने आप को मूल्यांकन करने की तथा अपने से प्रश्न करने की आवश्यकता है कि क्यों आज विपक्ष खारिज हो रहा है। स्वतंत्र सोच, स्वतंत्र अभिव्यक्ति तो केवल निर्भय तथा निर्मम प्रश्नाकुलता से उत्पन्न होती है। अंत में ये प्रसिद्ध पक्तियां ‘‘तुम्हारे पांव के नीचे कोई जमीन नहीं, कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं, मैं बेपनाह अंधेरो को सुबह कैसे कहूं, मैं नजारो का अंधा तमाशबीन नहीं।‘‘
 
डा0 क.कली
 
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