राष्ट्रीय

मोदी चिंतन के नये सुर


 
     बदले-बदले से सरकार नजर आते हैं, नरेन्द्र मोदी ने एनडीए संसदीय दल का नेता चुने जाने के बाद, वरिष्ठ भाजपा नेताओं, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर  जोशी और प्रकाश सिंह बादल के पांव छुए तथा जो संदेश दिया, उसमें उन्होंने अपने पुराने 2014 के नारे ‘‘सबका साथ, सबका विकास‘‘ में नयापन लाते हुए उसमें ‘‘सबका विश्वास‘‘ भी जोड़ा हैं। उन्होंने अपनी सोच को समावेशी बताते हुए सामाजिक एकता पर बल देने के लिए ‘‘समता-ममता‘‘ अर्थात ‘‘समभाव‘‘ भी ‘‘ममभाव‘‘ की बात कही। विनोबा भावे को उद्घृत करते हुए उन्होंने कहा कि चुनाव दूरियां पैदा करता है, दीवारें खड़ी करता है, लेकिन 2019 के चुनाव को दीवारें तोड़ने वाला और दिल जोड़ने वाला चुनाव बताया ।  एक नये भारत में नये सामाजिक व जनतां़त्रक युग की शुरूआत हुई है और वे केवल साक्षी ही नहीं अपितु रचियता भी हैं । मंडल और कमंडल की लड़ाई में निःसंदेह कमंडल-मंदिर, न केवल मंडल की राजनीति को खत्म करने में कामयाब रहा है, अपितु आडवाणी की मंदिर नीति रूपातंरण कर राष्ट्वाद से जोड़, देशव्यापी नया राजनैतिक विमर्श तय किया है । नतीजों की शाम 23 मई को भी उन्होंने भाजपा मुख्यालय पर अपने कार्यकर्ताओं से बात करते हुए कहा कि 21वीं सदी के भारत में केवल दो ही जातिंया हैं, एक गरीब और दूसरी वे जो गरीबों को मदद के लिए संसाधन प्रदान करने में सक्षम हैं अर्थात कार्ल मार्कस के समाज के आर्थिक विभाजन-सम्पन्न - हेवज अर्थात पूंजीपति तथा दूसरे विभिन्न साधन रहित - हेव नाट्स अर्थात सर्वहारा वर्ग । मार्कसवादी विचारधारा जाति संघर्ष के स्थान पर वर्ग संघर्ष की बात करती है, वहीं मोदी भी केवल दो वर्ग अमीर-गरीब की बात कर रहे हैं । देखने वाली तथा समझने वाली बात यह हैं कि एक साधन वंचित वर्ग तथा दूसरे साधन सम्पन्न वर्ग, पर वे उनके लिए साधन उपलब्ध करवाने वाला, उनको उपर ले जाने वाला - अपलिफट करने वाले के रूप में देखते है, अर्थात गरीबों को अपनी उन्नति व उत्थान के लिए अमीरों के रहमोकर्म, दान दक्षिणा व उनकी कृपा दृष्टि से आगे बढने की बात करते है।  वे वामपंथी उदारवादी की तरह अमीर तथा नये बनने वाले अमीर की बात नहीं करते अर्थात गरीबों के सशक्तिकरण की बात नहीं करते । वे देश के दलितों, पीड़ितों, शोषितो, वंचितों को एक वर्ग में रखते हैं तथा उनके उद्धार का जिम्मा साधन जुटाने वाले साधन सम्पन्न वर्ग पर डालते हैं । उन्होने अपने उसी भाषण में ऐसे भी कहा कि अमीर वर्ग के संतोष की बात भी की, उन्हें पता है जो टैक्स वे देते हैं, वह पाई-पाई उपरोक्त वर्ग के पास पहुंच रही है अर्थात गरीबों में बांटी जाने वाल सबसीडी व सहायता जारी रहेगी अर्थात सरकार माई-बाप का रोल चलता रहेगा। अरूण शौरी ने पिछली बार 2014 के चुनाव के बाद भी भाजपा पार्टी को ‘‘पुरानी कांग्रेस पार्टी प्लस गाय‘‘ बताया था अर्थात उनकी नीतियां तथा विचारधाराएं कांग्रेस वाली है । अब भी वहीं स्थिति है - पुराने जमाने भी कहते थे कि जाति तो अमीर की होती है, गरीब की कोई जाति नहीं होती, गरीब होना ही सबसे बड़ा अभिशाप है । 21वीं सदी के भारत में ये ही नयी दो जातियां है - गरीब व अमीर । समाजवादी, लोहियावादी राजनैतिक विचारधारा जोकि जातीय पहचान तथा राजनैतिक पहचान के सशक्तिकरण के समाज में परिवर्तन की बात करते थे, 2019 के चुनाव उस नीति को खारिज करते नजर आते है । आज का युवा अर्थात इक्कीसंवी सदी का भारत न मंडल चाहता है न कमंडल ।ं उस इबारत को भाजपा, मोदी जी के नेतृत्व में पढने में कामयाब रही, लेकिन देखना यह है कि समाज की आर्थिक इंजीनियरिंग अर्थात, वह समाज, जो आर्थिक आधार पर केवल दो ही वर्गीकरण - अमीर-गरीब की बात करता है जहां अमीर का और अमीर बनने के सारे रास्ते खुले हैं तथा जहां शासन अमीर का हिमायती है तथा गरीब अर्थात साधन विहीन को केवल वोट बैंक की तरह देखता है, आगे आने वाला समय चुनौतियों से भरा है । आर्थिक सुधार, घटती विकास दर, कृषक की दयनीय हालात, घटते निर्यात सब चिंता का विषय है। सुदृढ विपक्ष के अभाव में, आने वाली सरकार की जिम्मेवारी और भी बढ जाती है । जिस नये भारत, नये हिन्दोस्तान की बात बार बार की जा रही है, उसकी आशाओं और अपेक्षाओं पर खरा उतरना ही सरकार की मुख्य जिम्मेवारी होगी । अंत में, समय का पहियां चलता रहता है अर्थात परिवर्तन ही जीवन का नियम है, बदलते वक्त के साथ जो कदम ताल मिला लेता है, वही मुकद्र का सिकंदर कहलाता है ।
 
 
 
            डा0 क.कली
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