राष्ट्रीय

भारतीय अमीरों - अमेरिकन अमीरों से कुछ सीखो

भारतीय अमीरों - अमेरिकन अमीरों से कुछ सीखो ।

 
अमेरिका के आगे बढने और आज भी अमेरिका को सपने साकार करने के अवसरों की भूमि कहा जाता है तो उसका श्रेय अमेरिकनस की उदार, परस्पर सहयोग की भावना को जाता है । एक अमेरिकन करोड़पति ने अपने पिछले कालेज के सारे के सारे विद्यार्थियों जोकि लगभग 400 थे, उनके लोन का अदा कर उन्हें खुशी का तोहफा दिया । सबसे अमीर अश्वेत ने अपने एटलांटा कालेज में जिसमें कि ज्यादातर अफ्रीकन-अमेरिकन छात्र पढ़ते हैं, उनके शैक्षणिक लोनज से मुक्त करने के लिए 40 मिलियन डालर की ग्रांट दी है । मोरहाउस ब्रदर्स नामक परिवार ने कालेज में पढ़ रहे सभी 396 छात्रों को यह राशि उनके ऋणों को अदा करने के लिए उपलब्ध करवाई है, इसे लिबरेशन गिफ््ट कहा गया ताकि वे सब अमेरिकन मिलकर आगे बढ़े तथा अमेरिकन सपने को साकार करे । वो सभी ग्रेजुएट तो प्रसन्न हुए ही पर इस प्रकार के अनुभव पूरी मानवता के लिए संदेश होते हैं । हमारे यहां भारत के अरबपति, खरबपति या करोड़पति, बड़े बड़े धनाढ्य लोग, अपने धन का उपयोग मंहगी खर्चीली बच्चों की शादियों पर करते हैं, जो समाज में देखादेखी के चलते मध्यम वर्ग पर भी दबाव पैदा करती हैं । बड़े-बड़े धार्मिक आयोजनों पर भी करोड़ों रूपये खर्च कर दिये जाते हैं । भारतीय अमीरों के खर्च के पैटर्न का अगर अध्ययन तथा विश्लेषण किया जाए तो मुख्यतः बड़े-बड़े आलीशान घर बनाने तथा अपने बच्चों के विवाह- फैट इण्डियन वैडिंग्ज पर ही किया जाता है । व्यर्थ और दिखावे पर खर्च न केवल अनुत्पादकीय होता है, अपितु समाज में ईष्र्या, वैमनस्य तथा परस्पर होड़ की भावना उत्पन्न करता है । भारतीय अमीरों में अब तो विदेशों में जा कर बसने, विदेशों में घर खरीदने तथा विदेशी बैंको में पैसा जमा करने की प्रवृत्ति बढ़ती देखी जा सकती है । पहले जो 10 प्रतिशत धर्माथ निकाला जाता था, आय का दसवंत धर्म अर्थ, समाज अर्थ, जो खर्च होता था, अब वो भी, निजी पारिवारिक यात्राएं, जोकि बड़े बड़े धार्मिक स्थलों पर की जाती है, उनके निमित खर्च कर दिया जाता है । भारतीय अमीर सामुदायिक शिक्षा व सामूहिक स्वास्थ्य पर खर्च करने से कतराते हैं, उन्हें लगता है शिक्षा स्वास्थ्य पब्लिक गुडस हैं तथा इस क्षेत्र की जिम्मेवारी केवल सरकार की है । चैरिटी की दृष्टि से आर्थिक सहायता के दृष्टिकोण से। सीएसआर -कारपोरेट सोशल रिसपोन्सिबिलिटी - जोकि कम्पनियों के लिए, अपने लाभों का एक निश्चित प्रतिशत सामाजिक कार्यों पर खर्च करना होता है, अनिवार्य कर दिया गया है । उसमें कोई आशाजनक परिणाम नजर नहीं आये हैं। समाज में नेता भी अगड़े-पिछड़े, अमीर गरीब तरह तरह के वर्गीकरण करते हैं, पर उनको आगे बढ़ाने  उनका उत्थान करने, अवसर उपलब्ध करवाने में राजनीति करने के अलावा कुछ ज्यादा साथर्क या रचनात्मक नहीं करते । भारतीय मानसिकता आज भी परिवार केन्द्रित है, अपने निजी परिवार के हितों के आगे उन्हें कुछ और नजर नहीं आता । जीवन में परस्पर सहयोग,भाईचारा, सामूहिक उद्धत्त भावनाएं ही व्यक्ति को उदार, समाज में खुलापन तथा देश को महान बनाती हैं । भारतीय जनता के उद्धार, चाहे वह आर्थिक है या सामुदायिक या सामाजिक या सांस्कृतिक जागरण तभी हो सकता जब अपने निजी व्यक्तिगत दायरों को विस्तृत करेंगे जैसे कि अश्वेत अमेरिकन -राबर्ट स्मिथ मोरहाउस ने किया, उनसे प्ररेणा लेनी चाहिए । मैत्री, आपसी सम्मान तथा एक दूसरे को स्वीकारने की भावना का मूर्तरूप इस उदाहरण से हमारे सामने जीवंत हो उठता है । अंत में उदयभानू हंस की ये प्रसिद्ध पंक्तिया ‘‘ मत जिओ सिर्फ अपनी खुशी के लिए, कोई सपना बुनो जिंदगी के लिये, पौंछ लो दीन दुखियों के आंसू, अगर कुछ नहीं चाहिए बंदगी के लिए, सोने चांदी का दीपक जरूरी नहीं, दिल का दीपक ही बहुत है आरती के लिए ।
 
        डा0 क0कली
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