राष्ट्रीय

परीक्षाओं में श्रेष्ठ प्रदर्शन - लड़कियों के आगे बढ़ने में नया अवरोध ।

परीक्षाओं में श्रेष्ठ प्रदर्शन - लड़कियों के आगे बढ़ने में नया अवरोध ।

परीक्षा परिणामों में अक्सर अखबारों में ये सुर्खियां पढ़ने को मिलती है कि ‘‘लड़कियों ने फिर बाजी मारी‘‘ दसवीं व बाहरवीं में लड़कियों का परीक्षा परिणाम ज्यादातर लड़कों से बेहतर ही रहता है । पर सदियों से लड़कियों को शिक्षा से वंचित रखने के प्रयास, कभी पाप-पुण्य के आधार पर, तो कभी रूढियों और खोखली परम्पराओं का हवाला देकर, वर्तमान युग में भी जारी है । हाल में एक जगह मैं पढ़ रही थी कि ‘‘ बेटी बचाओं बेटी पढाओं‘‘ अर्थात बेटी जितनी पढ़ी लिखी होगी, उतना ही पढ़ा लिखा या उससे ज्यादा षिक्षित व उससे ऊंचे पद या बराबर के पद वाले के लिए दहेज भी ज्यादा देना होगा । पुरूष प्रधान समाज में आज भी येन केन प्रकेन और को पीछे धकेलने की कवायद जारी है । समानता के सारे दावों व आश्वासनों के बावजूद भी अंतर की एक दीवार आज भी जस की तस खड़ी है । टाईमस आफ इंडियां में छपी एक खबर के अनुसार - बेंगलुरु के सरकारी व सहायता प्राप्त महाविद्यालयों में लड़कियों के लिए ज्यादा कट-आफ रखी गयी है तथा उसी कक्षा में लड़कों के प्रवेश के लिए कम प्रतिशत कट आफ रखी गयी है । उदाहरण के तौर पर बेंगलुरु के एमईएस पी वी कालेज में लड़के यदि सांईस विशय में प्रवेश लेना चाहते हैं तो उनके लिए न्यूनतम अंक 92 प्रतिशत तथा वहीं लड़कियों के लिए 95 प्रतिशत रखी गयी है । कामर्स में प्रवेश के लिए भी लड़कियों के लिए 94 प्रतिशत और लड़कों के लिए 92 प्रतिशत है, ऐसा वहां के अन्य महाविद्यालयों में भी किया जा रहा है । इसके पीछे कारण ये बताया जा रहा है कि कालेजों में क्योंकि ज्यादा लड़कियों के अच्छे अंक आते है, उनकी संख्या बढ रही है तथा लड़कों की संख्या कालेजों में अपेक्षाकृत कम हो रही है, लड़कों की संख्या को बराबर लाने के लिए ये कदम उठाये जा रहे हैं । कितनी आश्चर्यजनक बात है कि जीवन के हर क्षेत्र में लड़कियों की उपस्थिति, चाहे वो प्रशासन हो, राजनीति के गलियारों जैसे कि संसद में उनकी संख्या हो, व्यवसाय प्रबंधन में उच्चस्तर पर हो, हर जगह नारी पीछे तथा पुरूष का वर्चस्व है । पर अब जब नारी को पंख लगे हैं, स्वतंत्रता मिली है उसे अपना श्रेष्ठ प्रदर्शन करने की, असीमित आकाश में अपनी उड़ान भरने की तो उसके लिए आकाश को और ऊंचा किया जा रहा है । अभी कल तक को स्त्री को पढ़ाना पाप समझा जाता था। आज यद्यपि स्त्री शिक्षा के सभी हिमायती है, वह स्वयं भी अपने को रूढ़ियों व सामाजिक कुरीतियों से मुक्त हो, उबारने में प्रयत्नरत हैं। शिक्षा के क्षेत्र में उसका श्रेष्ठ प्रदर्शन ही, उसके विरोध में ,उसे पीछे करने के लिए किया जा रहा है। उसके लिए ऊंची कट आफ रखी गयी है जोकि सरासर गलत है व समानता के संवैधानिक अधिकार का खंडन करती है ।
आस्ट्रेलिया की एक दंत कथा बताती है, एक जमाने में आग कैसे जलाई जाती है, उसका रहस्य केवल औरतों को ही मालूम था । इसलिए आग से होने वाले सारे लाभ वहीं उठाती थी, पर कहते हैं उस बस्ती में एक चालाक आदमी ने उस रहस्य को छीनने के लिए चाल चली । एक स्थान पर गड्डा खोदकर उसमें सांप इत्यादि विषैले जीव भर दिए। उपर से ढक कर, औरत को इस गड्डे में छिपा दिया। ऐसा लालच देकर, उनसे इनकी आग की छड़ियों का रहस्य ले लेता है । कहानी का सार यह है कि युगों से, पीढ़ियों से यही चलता आया है कि नारी से उसका श्रेष्ठतम छीनने के लिए पुरूष प्रधान समाज में तरह तरह से कभी पाप-पुण्य के नाम पर, कभी परम्पराओं के नाम पर, व्यवस्था, सभ्यता व संस्कृति के नाम पर पुरूष व स्त्री के बीच की दूरी बढ़ाई गयी है । आज नारी विभिन्न क्षेत्रों में बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रही है तथा अपना वजूद खोज रही है । जबकि उसे, एक कन्या को ‘‘अनचाहा‘‘ बना देने वाली मानसिकता से लड़ना पढ रहा है, पर वह लगातार सिद्ध कर रही है कि ‘‘ मैं भी हूं ‘‘ वह निरंतर अपनी क्षमता योग्यता को तराश, आगे बढ़ अपने अधिकारों को नये सिरे से परिभाषित कर रही है । पुरूष को, समाज को, इस में सहयोग करना चाहिए तथा इस परिवर्तन प्रक्रिया को तेज कर सार्थक कदम उठाने चाहिए । अंत में ‘‘ मैं भला कैसे बतांऊ, ये बात जमाने को, कितनी शिद्दत से लड़ा हूं, मैं जान बचाने को, डाल से टूटते पत्ते से, हवा से पूछा ‘‘क्या तुझे मैं ही मिला हूं जोर आजमाने को‘‘
 
डा0 क. कलि
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