राष्ट्रीय

आने वाले समय में राजनैतिक पटल पर आशा की लकीर



अब लोकतंत्र का चुनावी महापर्व सातवें चरण में पहंुच गया है तथा इसका पहला अति महत्वपूर्ण पार्ट चुनाव अभियान खत्म हो चुका है । अब लगता है पार्टी कार्यकर्ताओं, राजनेताओं और चुनाव करवाने वाले अधिकारियों को चैन की सांस आयेगी । पर जीवन में जैसे सांसों का आना जाना चलता है, वैसे ही अब अगले पढ़ाव-23 तारीख परिणामों के दिन के लिए कमर कसनी शुरू हो जाएगी, लगता है चुनावी थकान उतारने का अवसर भी नहीं मिलेगा, क्योंकि एगजिट पोलज पर लगा प्रतिबंध 19 तारीख से उठ जाएगा तथा परिणामों पर कयास लगने शुरू हो जाएंगे । यथार्थ परीक्षा तो सरकार बनाने के समय आयेगी । आशा करते है कि सत्ता का हस्तांतरण, परिणामों के आधार पर शांतिपूर्वक हो जाएगा, लेकिन जो भी सरकार सरकार बनेगी उसके लिए देश जिन स्थितियों, चाहे वे आर्थिक हों या सामाजिक या वैश्विक, से गुजर रहा है, उससे निपटना कोई आसान कार्य नहीं होगा । देश की अर्थव्यवस्था बुरे दौर से गुजर रही है । रोजगार व निवेश व निर्यात, सब निम्नतम स्तर पर पहंुंच गये हैं, जबकि तेल की कीमतों के बढने के साथ मंहगाई तथा मुद्रा स्फीति आकाश की तरफ मुंह किए हुए हैं । वैश्विक स्तर पर भी चीन और यूएसए का टकराव, पूरे गलोब के लिए खतरे की घंटी बजा रहा है । संभल-संभल कर पंाव रखने की जरूरत होगी । प्रजातांत्रिक भावनाओं की सही प्रदर्शन करते हुए जो भी पार्टी सत्तासीन होगी उसे विपक्षी पार्टियों को साथ ले, देश को आगे ले जाने के लिए ठोस कार्यक्रम व्यवहार में लाने होगे । विजय के जश्न के साथ साथ पार्टियों तथा उनके कार्यकर्ताओं को जिम्मेवारी की भावना से देश चलाना होगा ।
प्रजातंत्र, सक्षम व सशक्त विपक्ष के होने पर ही सही परिणाम देता है, क्योंकि विपक्षी नेता व उनके दल चैक व बैलेंस का काम करते हैं तथा क्योंकि वे भी जनता ने चुने हैं, वे भी जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं, उन्हें भी पूरा मौका मिलना चाहिए। हालांकि ये सर्वविदित है कि ऐसा परिवर्तन अर्थात परिपक्व दृष्टिकोण, राजनेताओं से, विशेषकर सत्ता जिनके हाथ में आयी होगी, उनसे अपेक्षा करना मुश्किल है, पर फिर भी सच तो यही है कि हमें परिपक्व व शक्तिशाली प्रजातंत्र ऐसे व्यवहार व प्रयासों से ही प्राप्त होगा जिसे निचले स्तर तक, निजी हमलों से लेकर गाली गलौच तक, परस्पर घृणा व वैमनस्य से भरे इस चुनाव अभियान जोकि एक महीने से ज्यादा देर तक चला, जो अब बहुत उबाउ तथा थकान भरा हो गया था उसके अन्त होते ही वातावरण में नई आकांक्षाओं तथा आशाओं का उदय होना स्वाभाविक हैं ।
भारतीय वोटर्स समझदार बनता जा रहा है । 2004 के चुनाव में भाजपा के हारने पर अटलबिहारी वाजपेयी जी से जब हार के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि भारतीय मतदाता बहुत समझदार है । हम इन्हें इण्डिया शायनिंग अभियान से विश्वस्त नहीं कर पाये तथा सोनिया गांधी पर लगाये गये व्यक्तिगत आक्षेपों की औछी नाकारात्मक राजनीति को लोगों ने नकार दिया है । आशा करते हैं कि मतदाता अब भी देश में सकारात्मक तथा रचनात्मक रवैये वाले नेताओं व पार्टी को चुनने व सरकार बनाने में कामयाब होंगे । समगच्छ हवम् सम् व हवम् कहने वाले देश में, विविधता में एकता लिए संस्कृति वाले देश में, ऐसी सरकार बनेगी जो जनतांत्रिक मूल्यों की रक्षा तो करेगी ही, समाज के बिखरे ताने-बाने को मजबूत करेगी तथा युवा भारत की आंतरिक ताकत को पहचान, विश्व स्तर पर अपनी छाप छोड़ने के लिए तैयार रहना होगा ।
डा0 क0कली

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