राष्ट्रीय

एक अदद सरकारी नौकरी की चाह


 
सी ई एस के सर्वे ने एक बार फिर युवाओं में सरकारी नौकरी की चाहत को तथा जीवन में आगे बढ़ने के लिये निजी क्षेत्र की नौकरी की अपेक्षा इसे ज्यादा आकर्षक माना है। सैंटर फार इक्विटी रिसर्च ने इस सर्वे में बदलते ट्रैंड पर प्रकाश डाला है। आरम्भिक दौर में औद्योगिक नीतियों में सरकार को माडल नियोक्ता का रोल अदा करने के लिये जिम्मेदारी सौंपी गई थी, पर 1990 के बाद उदारीकरण, भूमंडलीकरण तथा निजीकरण के चलते प्राइवेट सैक्टर युवाओं को अपने भारी भरकम पैकेजस तथा सुविधाओं के चलते लुभाने लगे। परन्तु अब फिर युवाओं में सरकारी क्षेत्र की नौकरियों के प्रति आग्रह तथा आकर्षण बढ़ रहा है, क्योंकि निजी क्षेत्र में बढ़ते काम के घण्टे, असुरक्षा तथा प्रैशर्ज के चलते रूझान कम हुआ है। कारपोरेट क्षेत्र से मोहभंग का कारण, अर्थव्यवस्था में ठहराव तथा निवेश की कमी, अवसरों का अभाव व अनिश्चितंता की स्थिति भी हो सकते हैं, लेकिन सरकार भी कोई अब पहले जैसी माडल नियोक्ता नहीं रह गई है। सरकारी क्षेत्र में भी नौकरियां प्राइवेट क्षेत्र की तरह हो गई है। एजेंसियों के द्वारा अनुबंध पर ही कर्मचारी रखे जा रहे हैं। नियमित नौकरियों की भर्ती बहुत कम हो गई है। यह एक विरोधाभासी स्थिति है। स्वरोज़गार, निजी उद्यम तथा स्टार्टअपस को बढ़ावा मिल रहा है, पर ज्यादातर युवा वर्ग नौकरी को ही प्राथमिकता देता है। मध्यम दर्ज़े तथा निचले दर्ज़ें के रोज़गार क्षेत्र में आज भी सरकारी नौकरी को प्राइवेट नौकरी से ज्यादा तरजीह दी जाती है। प्रतियोगिता तथा होड़ तो दोनों ही क्षेत्रों में है, पर युवा वर्ग अब फिर से सरकारी क्षेत्र की तरफ रूख कर रहा है। निजी क्षेत्र में प्रतिभादोहन के अवसर ज्यादा होते हैं। वहां प्रतिफल पर भी इतने प्रतिबंध नहीं होते, पर इसके बावजूद भी जो सम्मान तथा रूतबा सरकारी नौकरी  को मिल रहा है, उसके पीछे निजी क्षेत्र में बढ़ते शोषण, ज्यादा काम के घण्टे, पदोन्नति की ठोस नीति का अभाव भी हो सकते हैं। सबसे ज्यादा असुरक्षा की भावना जोकि अनिश्चितता से पैदा हो रही है, वह मुख्य कारण है विदेशी बैंकों, मल्टीनेशनलज़ तथा बड़े औद्योगिक ग्रुपस में विशेषज्ञों तथा टाप लेवल के कर्मचारियों को तो अच्छे वेतन तथा बढ़िया सुख-सुविधायें मिलती हैं तथा इन पर कब्जा भी विदेशों से शिक्षा प्राप्त, हाईफाई डिग्रियों वाले, आई आई टीज व आई आई एमस  वाले कर लेते हैं। निजी बड़े संस्थानों में निचले दर्जें तथा मध्यम दर्जें वाले कर्मचारियों का भरपूर शोषण होता है। संगठित क्षेत्र की नौकरी की उपलब्धता ही युवावर्ग के लिये रोजगार का आश्वासन है, पर निजी क्षेत्र में योग्य तथा कुशल प्रतिभाओं को टिकाने के लिये माडल नियोक्ता बनना होगा।
बेरोजगारी देश की सबसे पहली नम्बर एक समस्या है। इसके लिये निजी क्षेत्र तथा सरकारी क्षेत्र दोनों को कंधे से कंधा मिला, आगे बढ़ रोजगार के अवसर पैदा करने होंगे। सरकार को भी अपनी आर्थिक उपलब्धियों को केवल जीडीपी या विकास दर से मापना बंद करना होगा, उसे अपनी आर्थिक नीतियों का केन्द्र बिन्दु रोजगार बढ़ाना पड़ेगा। निजी क्षेत्र में भी निवेश बढ़ाना होगा तथा कार्य करने के घंटे, कार्य करने का वातावरण में सुधार की गुजांइश है। अलीबाबा के जैकमा का 9x9x6  का रूल अर्थात उनका कहना था कि मेरी कम्पनी में काम करने वालों को सुबह 9 बजे से शाम 9 बजे तक तथा सप्ताह के छः दिन काम करना होगा, ऐसे में तो लोग निजी क्षेत्र से पलायन ही कर जायेंगे। निजी क्षेत्र में श्रम प्रतिफल अर्थात रिवार्डस सीधे-सीधे कार्य निष्पादन अर्थात परफार्मैंस से जुड़े होते हैं, श्रम और पंूजी अर्थात मनुष्य और मशीन को एक ही कसौटी पर आंका जाता है। प्रोफैशनलस की मांग के चलते, निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र, दोनों क्षेत्रों में श्रम सम्बन्धी सुधार हुए हैं। समय चक्र बदलता रहता है, उदारीकरण तथा निजीकरण के दौर में युवा नौकरियों के मामले में प्राइवेट सैक्टर को महत्व दे रहे थे, परन्तु अब फिर प्रवृत्ति सरकारी क्षेत्र की ओर बढ़ रही है, पर सरकारें निजी क्षेत्र का अनुकरण कर, केवल अनुबंधीय कर्मचारी भर्ती कर रही है। सरकारी कर्मचारी भी नई भर्ती के अभाव में कर्मचारियों की कमी की वजह से काम के बोझ तले दबा हुआ है। कुछ भी हो, चाहे निजी क्षेत्र में, सार्वजनिक क्षेत्र में या पूर्णतयः सरकारी क्षेत्र में युवाओं को अदद नौकरी की तलाश है। अंत में वसीम बरेलवी के शब्दों में ‘‘मैं अपने ख्वाब से पिछड़ा नजर नहीं आता, तुं इस सदी में अकेला नज़र नहीं आता, अजब दबाव है इन बाहरी हवाओं का, घरों का बोझ भी अब उठता नज़र नहीं आता।’’                           डा0 क0कली
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