राष्ट्रीय

 डिजिटाइजेशन और प्राईमरी स्कूल के बच्चे

टैक्नोलजी और डिजिटाइजेशन  के इस युग में इंटरनेट साक्षरता या कम्प्यूटर साक्षरता अपरिहार्य हैं, पर टैक्नोलजी जिस तरह से मानवीय पक्ष को बेदखल कर रही है, यह चिंता का विषय है। मामला छोटे-छोटे प्राइमरी कक्षा तक के बच्चों का है तथा वह भी आर्थिक दृष्टि से मध्यम तथा निम्न वर्ग के बच्चों से जुड़ा है। हाल ही में काम वाली बाई, जिसका पति भी कामगर है, दोनों मिलकर 20,000 रुपये से उपर कमा लेते हैं। उन्होंने बड़ी मेहनत से तथा सिफारिश से अपने दो छोटे बच्चों को हरियाणा के सरकारी सार्थक स्कूल में करवाया। हालांकि शिक्षा वहां पर मुफ्त है, पर वह हमेशा उपरी खर्चों की शिकायत करती रहती है। जांच करने पर यह देखने में आया कि डिजिटाइजेशन ने न केवल अनके बच्चों की पढ़ाई व्यवस्था को मुश्किल बनाया है, अपितु खर्चीला भी बना दिया है। आये दिन उन को ‘‘सक्षम’’ द्वारा दिये गये टेस्ट पेपर्स अध्यापकों द्वारा मोबाइलस पर डाल दिये जाते हैं। सारा होमवर्क भी वाटसएैप के जरिये मोबाइल पर भेज दिया जाता है। बाजार में मोबाइल से कापी निकालने के तीन रुपये प्रति तथा फोटोस्टेट की एक रुपये प्रति लगाते हैं। अब चार पांच विषयों के एक या दो पेपर निकलवाने अर्थात प्रिंट लेने पड़े तो रोज का लगभग 15-20 रुपये खर्च बढ़ जाता है, ये तो न्यूनतम बताया जा रहा है। भारत में मां-बाप के पास बच्चों को आगे बढ़ाने के लिये सिवाय उन्हें शिक्षित करने के विकल्प ही क्या हैं, क्योंकि उनके पास जमा पूंजी तो होती ही नहीं, कार्यशील पूंजी जोकि मासिक आय से आती है, उसमें से इस प्रकार की मंहगी शिक्षा की व्यवस्था कैसे हो। टयूशन तथा कोचिंग सैन्टर पहले से ही शिक्षा के लिये मंहगे बनाये हुए हैं। टैक्नोलजी न केवल बच्चों से, स्वयं हाथ से लिखने और उसे समझने का मौका छीन रही है, वहीं मां-बाप के लिये फोटोस्टेट, पिं्रट लेने का खर्चा बढ़ा रही है। समयाभाव के कारण मां-बाप बाजार जाकर कई बार फोन से प्रिंट नहीं ले पाते तो उनका होमवर्क भी छूट जाता है। ये सब बातें छोटी दिखती हैं, पर व्यवहार में बड़ी कठिनाई तथा खीज़ की व्यवस्था उत्पन्न करती है। टैक्नोलजी, विशेषकर मोबाइलज तथा इंटरनेट जीवन में ह्यूमन टच मानवीय पहल की भी अवहेलना कर रहे हैं। इतने छोटे बच्चे, यथार्थ में कभी तीन घंटे लिखने का अभ्यास नहीं करते, क्योंकि ज्यादातर अब डाउनलोड कर लो, फोटोस्टेट करवा लो, पिं्रंट ले लो, मोबाइलज में स्टोर कर लो, इत्यादि शार्टकट अपनाते हैं। जीवन में इंटरनेट के योगदान को नकारा नहीं जा सकता, पर समाज में अन्तिम छोर पर खड़े, पिछले पायदानों पर खड़े असख्ंय अभिभावकों के लिये पहले से ही आर्थिक तंगी तथा बदहाली का सामना कर रहे पेरेटंस के लिये शिक्षा के क्षेत्र में ये नई चुनौतियां पैदा कर रहा है।

टैक्नोलजी की जानकारी तथा उसका उपयोग शिक्षा में छात्रों को आगे बढ़ाने के लिये होना चाहिये न कि पीछे धकेलने के लिये। कहते हैं कि टैक्नोलजी वे साधन है जो समाज में बराबरी लाने में बहुत बड़ा योगदान दे सकती है पर फिलहाल तो समाज में बढ़ती आर्थिक खाई को यह और गहरा सकती है। सरकारी स्कूल में जो निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था है, वह व्यावहारिक दृष्टि से भी निःशुल्क  होनी चाहिये। आज सरकारी स्कूलों में पढ़ने ही कौन जाते हैं। समाज में शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध करवाने में उनकी भूमिका ही नहीं बढ़नी चाहिये अपितु शिक्षा की गुणवत्ता के साथ-साथ गरीब एवं आर्थिक दृष्टि से पिछड़े बच्चों की व्यावहारिक कठिनाइयों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिये। आवश्यकता है कि इन छोटी-छोटी बातों को भी सुधारा जाये ताकि सरकारी स्कूलों में ड्राप आउटस की बढ़ती दर को कम किया जा सके।
अंत में, सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों की स्थिति पर एक शेयर ‘‘क्या हाल है ये न पूछो, ये कड़ा सवाल न पूछो, झटके से बच गया तो कैसे हुआ हलाल न पूछो।’’                                                                                                    डा0 क0कली
कुछ कहना है? अपनी टिप्पणी पोस्ट करें
tatkalnews.com
AAR ESS Media
newstatkal@gmail.com
tatkalnews181@gmail.com
Visitor's Counter : 68304203
Copyright © 2016 AAR ESS Media, All rights reserved.
Desktop Version