राष्ट्रीय

मूल्य विहीन तथा मुद्दा विहीन चुनावी अभियान में बेबस मतदाता

17वीं लोकसभा चुनावों के आखिरी पायदान पर खड़े सियासतदान, वोटर्स एवं पार्टिया अब 23 मई के इंतजार में हैं । इतने लम्बे समय तक खींचा चुनावों का राजनैतिक परिदृश्य, राजनैतिक मुददों पर कम, भावनात्मक तथा उत्तेजक बोल-बानियों के लिए ज्यादा जाना जाएगा । मतदाता भी खामोश है, मीडिया अंडरक्रंट की बात कर रहा है , पर सियासतदान है कि मानते ही नहीं, अपनी अपनी विजय के हुंकारे भर रहे हैं । चुनाव के हर चरण में सस्ती लोकप्रियता बटोरने तथा वोटर्स की रूचि बनाये रखने के लिए, किसी भी नेता के जुबान से फिसले शब्दों या कोई विवादित वाक्यों को आधार बना, उस पर ही तपसरा, डिबेट व विचार विमर्श करते रहते हैं । वो रेता ही क्या, जिसकी जुबान न फिसले, बस फिर क्या, सोशल मीडिया, अपने पूरे लाव लश्कर यानि फेसबुक, टवीटर, इंस्टाग्राम, वाटसएैप के साथ उस को पकड़ लेता है, खाल की बाल उखेड़ता है, प्रिंट मीडिया, इलैक्ट्रानिक मीडिया सब उस कथन या वाक्या के पीछे पड़ जाते हैं । मतदाताओं की क्या अपेक्षाएं, उसके मुददे क्या हैं, समस्याएं क्या हैं, सब पर्दें के पीछे चला जाता है । सनसनीखेज तथा संवेदनशील तथा विवादित कथन ही पूरे चुनावी चरण में चलता रहा है । पांचवे चरण में प्रज्ञा सिंह ठाकुर का ब्यान हावी रहा तो छठे चरण में सेम पित्रोदा का ब्यान सुर्खिया बटोरता रहा । बयानबाजी और जुमलेबाजी से चुनावी अभियान को ताजा रखने की कोशिश जारी है, पर कोई ठोस मुददों पर न तो रणनीति स्पष्ट दिखाई देती है न ही पार्टिया समाधान की बात कर रही है। पूरी ताकत से बस, उन बयानों को पढकर हवा भर, उत्तेजना का गुब्बारा फूटता है तब तक कोई नयी गुब्बारा हवा में तैयार मिलता है । शाब्दिक तौर पर सभी पार्टिया संवैधानिक मूल्यों तथा सिंद्धान्तों की बात करती है तथा देश की एकता व अखण्डता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाती हैं, परन्तु यथार्थ में, व्यवहार में उसका उल्टा कर रही हैं । वोट लेने के चक्र में कोई अपने को नीच जाति का बता रहा है तो कोई अपने को जनेउधारी हिंदु बता रहा है । भ्रष्टाचार के आरोप लगाने में तो सभी एक दूसरे से आगे हैं, हमाम रूपी राजनीति में सभी नंगे हैं और उपर से दावा यह है कि स्वयं राजनेता तथा उसकी पार्टी दुध की धुली हैं । मूल्य विहीन राजनीति से बढ़ते बढ़ते अब मुददा विहीन राजनीति की तरफ अग्रसर हैं । यह चुनाव भडकाऊ विवादित बयानों तथा बडबोलों का चुनाव रहा । सामाजिक व सांस्कृतिक विभाजनकारी शक्तियों ने सस्ती लोकप्रियता तथा चुनावी उत्तेजना को मुख्य उद्देश्य मान सिर उठाया, पर अब यह सामाजिक व सांस्कृतिक विभाजन, केवल मतभेद तक न सिमट कर व्यवहार तक आ पहुंचा है । चुनाव के परिणाम जो भी हो पर चुनाव को जंग बिना जिसमें सब कुछ जायज हो गया । सिद्धान्त, मूल्य , भाषा की शालीनता, सांस्कृतिक गरिमा, अस्मिता जैसे शब्द तो राजनेताओं के लिए परहेज हो गये हैं तथा गाली-गलोच, कर्कश तथा कठोर शब्दों के बाणों से एक दूसरे को घायल करने में लगे रहे । देश की अर्थव्यवस्था कैसे पटरी पर आयेगी आर्थिक नीतियां कैसी होगी, समाज में समरसता कैसे आयेगी, सांस्कृतिक विभिन्नता में एकता कैसे होगी, हमारे राजनेता आगे न देख अर्थात फारवर्ड लुकिंग न हो, केवल बैकवर्ड लुकिंग, यानी आपने पिछले 70 साल में क्या किया, या आप आपने पिछले पांच वर्ष में क्या किया, इसी पर चुनावी चर्चा गर्माई रही । इन चुनावों में लफजों को महकते गुलाबों की तरह उपयोग न कर उन्हें दहकते अंगारों की तरह एक दूसरे पर उछाला गया। अन्त में मतदाताओं की स्थिति पर यह प्रसिद्ध पंक्तियां उद्घृत हैं ‘‘ कुछ तो शख्सियत हैं इस प्रजातंत्र में, कुछ तो बात है इस करामाती मंत्र में, वोट देता हूं फकीरों को, कम्बख्त शहनशाह बन जाते हैं और हर बार हम, वहीं के वहीं रह जाते हैं। रह जाते हैं हर बार हम अंगुली रंगाने के लिए, नये फकीरों को फिर से बादशाह बनाने के लिए ।


                            डा0 क0 कली

कुछ कहना है? अपनी टिप्पणी पोस्ट करें
tatkalnews.com
AAR ESS Media
newstatkal@gmail.com
tatkalnews181@gmail.com
Visitor's Counter : 68215031
Copyright © 2016 AAR ESS Media, All rights reserved.
Desktop Version