राष्ट्रीय

शतप्रतिशत परिणाम

सीबीएसई 10वीं तथा 12वीं के परिणाम तथा उसके समकक्ष आईसीएसई के परीक्षा परिणामों में छात्र-छात्राओं ने जिस तरह कमाल किया है वह तो काबिले तारीफ है ही, पर जिस तरह पूरे -बटा - पूरे अंक बटोरे हैं, वह हैरान कर देना वाला है । सीबीएसई की दसवीं की परीक्षा में 13 छात्र 499 अंक संयुक्त प्रथम स्थान, 25 छात्र 498 अंक के साथ दूसरा स्थान तथा 59 छात्र 497 अंक लेकर तीसरे स्थान पर रहे । यह अंकों का खेल चैंका देने वाला है । क्या हमारे होनहार अब ज्यादा पुरवर व बुद्धिमान हो गये हैं, जो झोलिया भर-भर कर अंक ला रहे हैं । पूरा सप्ताह,आप अखबारों में बड़ी-बड़ी कोंचिंग संस्थाओं तथा नामी गिरामी स्कूलों के पूरे पूरे पृष्ठ के विज्ञापन देखे जा रहे हैं, जोकि अपनी संस्था के छात्रों के श्रेष्ठतम प्रदशर्न को दिखाते हैं । ये परिणाम हमें सोचने के लिए मजबूर करते हैं कि क्या वास्तव में विद्यार्थियों के मानसिक स्तर में अत्यधिक सुद्यार हुआ है कि हर विषय में पूर्णांक प्राप्त कर रहे हैं या ये सिर्फ नम्बर लाने वाले रिमोट बनते जा रहे हैं । अंक अधारित उपलब्धियां क्या वास्तव में जीवन में सफलता का आश्वासन हैं । हां ये शत-प्रतिशत अंक मां बाप व छात्र को तत्कालिक प्रसिद्धि तो देते हैं तथा उनके लिए अच्छे तथा प्रसिद्ध शैक्षिणक संस्था में प्रवेश के द्वार खोल देते हैं पर क्या उनकी व्यवहारिक योग्यता, समझ तथा बुद्धिमत्ता की भी गारंटी देते हैं, ये विचारणीय हैं । ये नम्बर लाने व बटोरने की संस्कृति बढ़ते कोचिंग संस्थानों तथा प्राईवेट स्कूलों की देन है, जो बच्चों का अंक लाने की तकनीक तथा परीक्षा में कैसे सर्वाधिक अक लिए जाए । उसकी कुंजी उपलब्ध करवाते हैं । रटंतु तोते की कतारों में वृद्धि करती ये परीक्षा प्रणाली केवल सूचनाएं एकत्र करने उन्हें प्रस्तुत करने की योग्यता का मूल्यांकन करती हैं । एक ढर्रे पर चलने की निपुणता तथा सधारणतः अर्थात मीडियोक्रिटी को प्रोत्साहित करती हमारी शिक्षा प्रणाली तथा उसके मूल्यांकन विधि में नवीनता लाने की आवश्यकता हैं । कल्पना, जिज्ञासा, कुछ नया करने की उत्कंठा, रचनात्मकता जैसे गुण जोकि शुरू से बच्चों मेें भरे व तराशे जा सकते हैं, उनका न तो इस परीक्षा प्रणाली में मूल्यांकन होता है न ही इन्हें तवज्जों दी जाती है । खोखले नम्बर केवल खोखली सफलता का ही आशवस्त करते हैं ।ै जीवन की लम्बी दौड़ के लिए शिक्षा का उदेश्य छा़त्रों में प्रतिभा पहचानना तथा उन्हें तराश कर जीवन संग्राम के लिए तैयार करना होता है, परन्तु हमारे होनहार टापर्स तथा 90 प्रतिशत और 80 प्रतिशत से अधिक अंक लाने वाले, डिग्रियों तथा प्रमाणपत्रों पर तो गर्व कर सकते हैं, यथार्थ जीवन में कुछ नया, मौलिक तथा असाधारण कर पाते हैं या नहीं ये विवादास्पद हैं । यहीं कारण है कि असंख्य ग्रेजूएट, पोस्ट ग्रेजूएट, पी एच डी छात्र सरकारी चपड़ासी या माली की नौकरी के लिए भी आवेदन कर देते हैं । केवल अंक प्राप्त करने वाले असंख्ष् इंजीनियरस जब नौकरी के लिए जाते हैं तो उन्हें रोजगार के योग्य नहीं समझा जा रहा, क्योंकि उनमें कौशल तथा व्यवहारिक ज्ञान की कमी होती है,वहां डिग्री व अंकों का महत्व नहीं होता । जीवन में आई.क्यू. से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है आई केन । भारत को अगर विश्व गुरू बनना है तथा विश्व में अग्रणी अर्थव्यवस्था बनना है तो शिक्षा प्रणाली में परीक्षा परिणामों के मूल्यांकन पद्धति में आमूल चूल परिवर्तन की आवश्यकता है । असद्यारणतः लीक से हटकर सोचने की क्षमता, नया करने का उत्साह, नवप्रवर्तन, अन्वेषण, शोध, मौलिकता के प्रति आग्रह, ये सब गुण व विशेषताएं आज की गलाकाट प्रतियोगिता तथा तकनीक के युग में आने के लिए आवश्यक है, उन्हें महत्व दिया जाना चाहिए तथा उनके विकास पर ही बल दिया जाना चाहिए । अंकों को बढावा देने वाली, तत्कालिक सफलता को ही इतिश्री माने वाली यह मूल्यांकन प्रणाली के बल ध्ंाधेबाजी व औसतन निष्पादन की ओर ही लेकर जाता हैं । अतः आवश्यकता है इस मूल्यांकन प्रणाली पर नये सिरे से इस पर विचार किया जाए । अन्त में टैगोर के शब्दों में ‘‘ आज शिक्षा उस रथ की तरह हैं, जो उसको अपने साथ बैठाकर आगे नहीं ले जाती, बल्कि उनकों अपने पीछे खींच रही हैं । ‘‘

               डा0 क0 कली

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