हरियाणा

राजनैतिक आकांक्षाए और विवाहित जीवन

हाल ही में, भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन के साक्षात्कार में एक आश्चर्यजनक खुलासा किया कि अगर वो राजनीति में प्रवेश करना चाहे भी तो नहीं कर सकते क्योंकि ऐसा करने पर उनकी पत्नी उन्हें छोड़ कर चली जाएगी । वास्तव में राजनीति एक ऐसे मोड़ पर आ चुकी है कि उसमें 24 घण्टे 7 दिन वाली दिनचर्या लाजिमी हो गयी है । अपने ही देश में देख लीजिए - प्रधान मंत्री हो, या मुख्यमंत्री, ज्यादातर उनमें से अविवाहित है, मेरे देश के प्रधान मंत्री - नरेन्द्र मोदी हो या हरियाणा के मुख्य मंत्री मनोहर लाल खट्टर, सच्चे कर्मयोगी, हर समय डियूटी पर होने का दावा इस दम पर करते हैं क्योंकि उनकी निजी पारिवारिक जिम्मेवारियां नहीं । उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक जी से जब उनके एकाकीपन पर सवाल पूछा गया तो उनका सहज ही उत्तर था कि उड़ीसा के चार करोड़ से ज्यादा लोग उनका ही तो परिवार है वे अकेले कहां हैं । गांधी परिवार, जिस पर वंशवाद बढ़ाने की सबसे ज्यादा आलोचना की जाती है, राहूल गांधी भी अभी तक एकाकी है, मायावती, ममता बनर्जी भी उन्हीं की श्रेणी में आती है । योगी आदित्यनाथ तो फिर महन्त-साधु परम्परा से आये है तो उनके निजी परिवार का प्रश्न ही नहीं है । सत्ता का खेल राजनीति इतनी मनमोहक है, तथा अब तो व्यस्तता तथा राजनीति में आगे निकलने की होड़ इस हद तक भ्रामक हो गयी है कि आपको अपना पूरा समय, पूरी शक्ति इसमें झोंकनी पड़ती है । पहले भी लोग आदर्श व निष्ठा के चलते शादी नहीं करते थे तथा अपना सारा जीवन ऐसे निश्चित घ्येय के लिए समर्पित कर देते थे। क्योंकि उन्हें लगता था कि पारिवारिक जिम्मेवारियां उन्हें उलझा देगी तथा वह वे सब नहीं कर पायेगे जो वे जीवन में करना चाहते हैं, इसलिए ही हमारे शास्त्रों में ब्रह्मचर्य की महिमा की गयी है । इसी पर मुझे दिवंगत पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी का कथन स्मरण हो आता है जब उन्होंने बड़े स्पष्ट शब्दों में बिना लाग लपेट के सच्चाई कह दी थी कि मैं स्वयं से प्यार करता हूं, पर मैं अपने परिवार को अपने से ज्यादा प्यार करता हैं , पूरे राष्ट्र से ज्यादा मैं विश्व को प्यार करता हूं तथा पूरी मानवता को मैं सबसे ऊपर अपने जिओजान से ज्यादा प्यार करता हूं ‘‘ यहीं विश्व बन्धुत्व की भावना विस्तृत आयाम पाती हैं । परिवार का न होना राजनीति में, आज तुरूप का पत्ता हो सकता है जैसे कि मोदी जी कहते हैं कि वे तो फकीर हैं, अपना खाली झोला वापिस लेकर चले जाएंगे, लेकिन प्रश्न तो भावनाओं को विस्तृत करने का है, प्यार और त्याग की परिधियां को विस्तार देने का है, संकुचित दायरों से बाहर आने का है । पारिवारिक व्यक्ति को जितना जिम्मेदारी का बोद्य होता है, उतना एकांकी व्यक्ति को नहीं । परिवार की अपनी मांगे व अपेक्षाएं होती है, पर परिवार बंधन बनने लगेंगे तो यह संस्था एक दिन अपना अस्तित्व खो देगी । परिवार वाला ही परिवार में विभिन्नता में एकता के महत्व को समझ सकता है । जाति व धर्म की भाषा विभिन्नता को प्रथकता का आधार बनाना आज राजनेताओं का मुख्य उद्देश्य तथा मुख्य साधन बन गया है क्या इसके पीछे लुप्त होती पारिवारिक भावना कहीं मुख्य कारण तो नहीं है ? अंत में 

‘‘ कितने अजब नजारे है, कितनी गजब बातें हैं सब कुछ बटोरने में लगे हैं, खाली हाथ जाने के लिए "
                      डा0 क. कली

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