राष्ट्रीय

राजनीति के खेल में सैलीब्रिटिज

राजनीति के खेल में, अभिनेता, फिल्मी सितारे, महान खिलाड़ी यानि गैर राजनैतिक सैलीब्रिटिज भी अपना भाग्य आजमाते रहे हैं। दक्षिण भारत में नेता-अभिनेता दोनों एक साथ लोकप्रिय रहे हैं, वहां तो रीयल लाईफ और प्रोफेशनल लाईफ में मामूली सा अंतर रहा है। जो फिल्मी दुनिया में सुपरस्टार रहता है तो राजनैतिक जिंदगी में भी जनता ने उन्हें चुनावों में भरपूर सहयोद देकर शासन में भी अगुआ बनाया है। जयललिता, एमजीआर करूणानिधि इसके मुख्य उदाहरण गिने जा सकते हैं। लेकिन अब उत्तर भारत में भी उसी तरह फिल्मी सितारों तथा खेल जगत के जाने-माने लोगों को भी सीधे चुनावी दंगल में उतारा जा रहा है। जीवन की दूसरी पारी खेलने के लिये राजनीति अब एक क्षेत्र बन गया है। समर्पित कार्यकर्ताओं तथा अपने मंजे हुए राजनेताओं की अपेक्षा पार्टियां इन सैलीब्रिटिज को टिकट देकर एक प्रकार का दाव खेल रही हैं। यह कोई नया ट्रैंड तो नही है, पर जिस तरह से दिल्ली में ही इतने सारे सैलीब्रिटिज उतारे गये हैं, उससे तो देखकर लगता है कि भारतीय वोटर्ज प्रत्याशी में राजनैतिक परिपक्वता तथा अनुभव के स्थान पर राजनैतिक सूझबूझ से अनजान एवं चकाचैंध से ज्यादा प्रभावित होते हैं। भाजपा की टिकट पर मशहूर गायक हंसराज हंस उत्तरपश्चिमी दिल्ली से, गौतम गंभीर पूर्वी दिल्ली से और बाक्सर विजेन्द्र सिंह कांग्रेस की टिकट पर दक्षिणी दिल्ली से चुनाव लड़ रहे हैं। चुनावों में इस तरह इतने सैलीब्रिटिज को उतारा जाना, जहां भारतीय वोटर्स की प्राथमिकता तथा उसकी परिपक्वता पर सवालिया निशान तो लगाता ही है, पर यह अनुसंधान तथा गंभीर अध्ययन का विषय भी हो सकता है। हालांकि संविधान में, अन्य क्षेत्रों में अर्थात गैर राजनीति क्षेत्रों के नेताओं तथा महारत हासिल लोगों को राजनीति में जाने के लिये राज्यसभा से सदस्यता देने का प्रावधान है, परन्तु अब तो सीधे चुनावी दंगल में पार्टियां टिकट देकर उन्हें उतार रही हैं। पहले पार्टियों के प्रचार व प्रसार के लिये लोगों को रैलियों व जनसभाओं में लाने के लिये अभिनेताओं व सैलीब्रिटिज को बुलाया जाता था पर अब तो सस्ती लोकप्रियता को भुनाने हेतु पार्टियां उन्हें टिकट दे रही हैं तथा उनके लिये भी अब उनका कैरियर ढलान की ओर है तो दूसरी पारी खेलने का सहज मौका मिलना फायदे का सौदा है। नायक प्रधान तथा नायकत्व के मोह अर्थात Hero Worshiping की मानसिकता से बंधी भारतीय जनता आज भी कामकाज, उपलब्धियों तथा अनुभव से प्रेरित नहीं होती। नाम परिचित होना चाहिये, काम किसने देखा? यही भावना ही पार्टियों को अपने कार्यकर्ताओं, नेताओं तथा अनुभवी लोगों को टिकट देने की बजाय इन सितारों की तरफ आकर्षित करती है। यही कारण है कि दक्षिण भारत की राजनीतिक प्रवृत्ति अब उत्तर भारत की राजनीति में भी सितारों के जमघट के रूप में देखी जा सकती है। किरण खेर, सनीदेओल, उर्मिला मातोंडकर भी इस चुनावी उत्सव को आकर्षक बनाने के लिये मैदान में लाये गये हैं। सितारों की लोकप्रिय छवि आम जनता के लिये बोरिंग चुनावों को उत्साहवर्धक तथा रूचिकर तो बनाते ही हैं, लेकिन पार्टियों के लिये कितनी सीट जीत पाते हैं, इसका अध्ययन तथा मूल्यांकन किया जाना चाहिये। अंत में इन सितारों के राजनीतिक अखाड़े में उतरने पर कुछ पंक्तियां -

"बदलते मौसम की खुशबू इन फिजाओं में हो आपकी आमद का अहसास इन हवाओं में हो"
                           डा0 क0कली

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