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अब लड़कियां मांगेंगी मोटा दहेज

COURTESY NBT DEC 22

अब लड़कियां मांगेंगी मोटा दहेज


बाल मुकुंद
चीनी लड़के किफायत से रहकर पैसे बचाते और घर बनाने की कोशिश करते हैं ताकि लड़कियां शादी के लिए उनकी ओर आकर्षित हो सकें


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भारत और चीन में बढ़ता लैंगिक असंतुलन कई संकट पैदा कर रहा है
अमेरिकी अखबार ‘वाशिंगटन पोस्ट’ ने पिछले दिनों आबादी के लैंगिक असंतुलन पर एक लेख प्रकाशित किया है। भारत और चीन की आबादी में महिलाओं के घटते अनुपात पर साइमन डेनयर और एनी गोवेन द्वारा लिखित यह लेख बताता है कि आबादी में लैंगिक असंतुलन से किस तरह अपराध, एकाकीपन और अवसाद बढ़ रहा है। हमारे सामाजिक रिश्तों में बदलाव आ रहे हैं और आर्थिक विकास भी प्रभावित हो रहा है। अद्यतन जनगणनाओं के अनुसार भारत और चीन में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की कमी 7 करोड़ से भी ज्यादा हो चुकी है। 2011 के सेंसस के मुताबिक भारत में प्रति एक हजार पुरुषों पर सिर्फ 943 स्त्रियां हैं। चीन में आज की तारीख में स्त्री-पुरुष की आबादी का अनुपात 48 और 52 प्रतिशत का है। ये आंकड़े हमें तब तक बहुत भयानक नहीं लगते, जब तक उनमें युवाओं और बच्चों के अनुपात हमें अलग से देखने को नहीं मिलते।

भारत में 0 से 6 वर्ष की आयु के प्रति एक हजार लड़कों पर सिर्फ 919 लड़कियां जीवित रहती हैं। 2017 में विश्व बैंक द्वारा कराए गए अध्ययन के मुताबिक यहां की युवा आबादी में प्रति हजार वयस्क पुरुष पर वयस्क स्त्रियों की संख्या 939 है और जो ट्रेंड है, उसे देखते हुए लगता है कि यह फासला 2031 तक और बढ़ेगा। चीन की एक अरब 40 करोड़ की जनसंख्या में 3 करोड़ 40 लाख पुरुष बिना जोड़े के रहने को अभिशप्त हैं। यह संख्या कैलिफोर्निया या पोलैंड की आबादी के बराबर है। लेकिन भारत में तो ऐसे पुरुषों की संख्या और भी ज्यादा, 3 करोड़ 70 लाख है! इन दोनों देशों में 5 करोड़ बिना जोड़े वाले पुरुष 20 साल से कम उम्र के हैं। सबसे ज्यादा गैप 15 से 29 साल के आयु वर्ग में है, जो शादी की उम्र मानी जाती है। इससे समाज में छड़ों की संख्या बढ़ रही है। जनसंख्या अध्ययन के चीनी विशेषज्ञ शी शुजुओ कहते हैं कि ‘यह एक जोखिम वाली स्थिति है। जब इन कुंवारे युवाओं में स्त्री संसर्ग की इच्छा होगी, तब उन्हें स्त्रियां नहीं मिलेंगी। इससे समाज में महिलाओं को लेकर पूर्वाग्रह और अपराध बढ़ेंगे, जिसकी परिणति मानव तस्करी, वेश्यावृत्ति, यौन शोषण और स्त्री उत्पीड़न के रूप में होगी। करोड़ों लोगों की शादी न हो पाना हमारी सामाजिक संरचना को अव्यवस्थित करेगा।’

अपने देश के कुछ राज्यों (हरियाणा और पंजाब) में स्त्री-पुरुष अनुपात के असंतुलन का प्रभाव वहां के सामाजिक व्यवहार और यौन अपराधों में स्पष्ट रूप से देखने को मिल रहा है। वाशिंगटन पोस्ट के मुताबिक आबादी का जो फर्क पैदा हो चुका है, उसका असर अगले दो तीन दशकों में अपने चरम पर पहुंचने लगेगा, जब 0 से 06 साल के आयु वर्ग वाली मौजूदा पीढ़ी जवान होगी। इसकी भरपाई होने में शायद पूरी 21 वीं सदी खत्म हो जाए। चीन में पुरुषों की बहुतायत के परिणाम अब साफ नजर आने लगे हैं। वहां शादी के लिए कई जगहों पर लड़कियों के मां-बाप की मंजूरी पाने के लिए तीस हजार डॉलर तक की रकम देनी पड़ रही है। युवा पुरुष नौकरियों में ज्यादा मेहनत कर रहे हैं। वे पैसे बचाते हैं और घर बनाने की कोशिश करते हैं, ताकि लड़कियां शादी के लिए उनकी ओर आकर्षित हो सकें। बचत की इस इच्छा के कारण वे अपने उपभोग और खर्च में कटौती करते हैं।

भारत में अभी वर पक्ष की ओर से वधू पक्ष को दहेज देने की प्रथा नहीं शुरू हुई है, लेकिन शादी के लिए लड़कियों को खरीदने की खबरें जरूर मिलने लगी हैं। लड़कियां हर पुरुष को वर के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं हो रही हैं। उनके पैरंट्स भी अब उन्हें किसी के पल्ले नहीं बांध रहे। वे विकल्प देख रहे हैं कि कौन ज्यादा पढ़ा-लिखा है, कौन बेहतर नौकरी करता है। 1961 का सेंसस बताता है कि तब 15 से 19 साल के बीच 70 प्रतिशत लड़कियों की शादी हो जाती थी। आज इस उम्र तक सिर्फ 19 प्रतिशत लड़कियां ही ब्याही जा रही हैं। लैंगिक असंतुलन यहां के श्रम बाजार को भी प्रभावित कर रहा है। भारत ही नहीं, चीन में भी पुरुषों के गांव छोड़ कर शहरों की तरफ भागने की बड़ी वजह उस बेहतर जीवन को प्राप्त करने की इच्छा है, जो शादी के बाजार में उनकी स्वीकार्यता बढ़ा सके। इस पलायन से गांव खाली हो रहे हैं, जिसका असर खेती पर पड़ रहा है। शहरों में श्रमिकों की मजदूरी घट रही है, क्योंकि पलायन के कारण वहां बहुतायत में श्रमिक उपलब्ध हैं। पलायन के कारण गांवों में छूटे परिवार अकेले और असुरक्षित हो गए हैं। शहरों में एकल पुरुष रसोई बनाना तथा घरेलू कामकाज निपटाना सीख रहे हैं। जो शादी नहीं कर पाते वे भावनात्मक सहारे के लिए अपनी मां या बहन पर आश्रित रहते हैं, जिससे उनका बोझ बढ़ता है।

इस असंतुलन की वजह हमारी वैज्ञानिक प्रगति, संस्कृति और सरकारी नीतियां रही हैं। चीन में 1979 से एक बच्चा नीति थी तो 2015 तक ज्यादातर चीनियों ने बेटे ही पैदा किए। भारतीय समाज को भी पहले बेटा ही चाहिए। उन्हें वंश को आगे बढ़ाने और मुखाग्नि देने के लिए जरूरी समझा जाता है। हाल में एसोचैम ने देश के दस बड़े शहरों में कामकाजी महिलाओं पर एक सर्वे किया तो पाया कि उनमें से ज्यादातर एक के बाद दूसरा बच्चा नहीं चाहतीं। और बच्चा जब एक ही होगा, तो चॉइस बेटे की ही होगी। और जब चॉइस इतनी स्पष्ट है तो तकनीकी का सहारा भी लिया जाएगा, चाहे जिस तरह से हो। इसीलिए कानून के बावजूद बच्चियों की जन्म दर आज भी यहां कम है। लिंग की पहचान इसका मुख्य कारण है। ध्यान रहे, लैंगिक असंतुलन से पैदा संकट का असर सिर्फ चीन या भारत तक सीमित नहीं रहेगा। धीरे-धीरे पूरे एशिया पर और आखिर में यूरोप की अर्थव्यवस्था पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा

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