हरियाणा

जलवायु परिवर्तन के मानवीय जीवन पर प्रभाव

जलवायु परिवर्तन वैश्विक स्तर पर राजनीति का बहुत बड़ा मुद्दा है, पर स्थानीय तथा राष्ट्रीय स्तर पर सिवाय चर्चा के कुछ नहीं किया जा रहा। जल और वायु दोनों जीवनदायी तत्व, प्रदूषण के चलते, दूषित हो गए हैं तथा इनमें घुलता जहर मानवीय जीवन के लिए खतरा बन गए हैं। प्रकृति के नि:शुल्क उपहारों का इतनी निर्ममता से विदोहन तथा उसके अत्यधिक शोषण की हद तक प्रयोग ने हमें विकास के उस मुहाने पर खड़ा कर दिया है, जहां विकास कुछ एक को फायदा तथा ज्यादा के लिए नुकसानदायक सिद्ध हो रहा है। पुरानी कहावत है कि सारी शक्ति तो हवा-पानी में होती है, पर आज जिस तरह से अंधाधुंध इन प्राकृतिक स्रोतों का प्रयोग हो रहा है, वो दिन दूर नहीं जब प्रकृति हमारी मित्र न होकर, शत्रु हो जाएगी। जल संकट इतना बढ़ चुका है कि अगला महायुद्ध इस पर होगा तथा चारों ओर पानी के होते हुए भी शुद्ध तथा शीतल जल के लिए मारामारी होगी। यही स्थिति जहरीली हवा की बन रही है। इनको अगर इनकी कीमत लगाई जाती है, जैसा कि वर्तमान में हो रहा है, साधन सम्पन्न व्यक्ति तो खरीद लेगा, पर जीवन चलाने के लिए साधनों से वंचित गरीब कहां जाएगा?

शहरीकरण की तरफ जो झुकाव बढ़ रहा है, उससे ग्रामीण आंचलों से आए कामगार, श्रमिक- रोजगार टोहता युवा भारत एक अलग तरह की महंगी तथा घटिया जीवन शैली जीने के लिए मजबूर है, जहां उसे जहरीली हवा और दूषित पानी मिलता है तथा वह तरह-तरह की बीमारियों का शिकार हो रहा है। आर्थिक विकास का जो मॉडल हमने चुना है, उससे प्रत्यक्ष रूप से तो जलवायु को नुकसान हो ही रहा है, परोक्ष भी पर्यावरण को खतरा पैदा हो रहा है। गांवों में कृषि फायदे का सौदा नहीं रहीं। रोजगार नहीं है तो क्रयशक्ति नहीं है, तो व्यापार-व्यवसाय का स्तर भी नीचा है। अब तो गांवों में भी आबो-हवा वैसी नहीं रही। स्वास्थ्य तथा शिक्षण सुविधाओं के अभाव के चलते, सबकी दिशा शहरोन्मुखी हो गई है। कस्बे, शहरों की तरफ, शहर नगरों की ओर, नगर महानगर में, महानगर मैट्रो बड़े-बड़े राज्यों का रूप ले रहे हैं। महानगरीय जीवन में दो स्पष्ट वर्ग पनप रहे हैं- इण्डिया जो साधन सम्पन्न है, भारत जो साधन विहीन है। इस पिछड़े, ग्रामीण तथा साधनहीन भारत को जलवायु परिवर्तन सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहा है, क्योंकि इण्डिया अग्रसर हो रहा है, तो इसको रौंदकर आगे बढ़ रहा है। उदाहरण के तौर पर पब्लिक ट्रांसपोर्ट कारगर नहीं होती, घाटे में चलती है, क्योंकि प्राइवेट- व्यक्तिगत वाहन के साधन- कारें उपलब्ध है, जिनकी बड़ी संख्या ट्रैफिक जामों की समस्या तो पैदा करती है, वायु को भी प्रदूषित करती है। पब्लिक वस्तुएं जैसे कि हवा-पानी जिनपर सबका बराबर हक होता है, आज निजी बनती जा रही है। लेकिन अनेक स्रोत जो कि प्रकृति के हाथ में सूखते जा रहे हैं। विकास की नई परिभाषा गढऩी होगी, जिसमें विश्व पहले से बेहतर बने तथा हमारी आने वाली नस्लों का जीवन सुखमय तथा मंगलकारी हो। आर्थिक विकास के साधनों तथा तरीकों पर फिर से सोचने की जरूरत है। मंगल ग्रह पर जीवन है या नहीं, यह अनुसंधान का विषय बने न बने, पर जीवन में मंगल हो, इसका प्रयास जारी रहना चाहिए।

                                                                               (डॉ० क० ‘कली’)

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